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मौजा-बेचिराग - किस्सा बियाबानों का

Updated at : 08 Sep 2019 2:22 AM (IST)
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मौजा-बेचिराग - किस्सा बियाबानों का

ऐश्वर्या ठाकुर आर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर सुनसान दोपहरों में ऊंघते हुए निर्जन वीरान शहरों की कहानी कहना इतिहास की कब्रों को कुरेदने जैसा होता है. विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी हो या मुगल सियासत का केंद्र रहा फतेहपुर सीकरी, मोहम्मद बिन तुगलक का बसाया शहर दौलताबाद हो या बाज बहादुर-रूपमती के प्रेम की गवाही देता मांडू, […]

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ऐश्वर्या ठाकुर

आर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर
सुनसान दोपहरों में ऊंघते हुए निर्जन वीरान शहरों की कहानी कहना इतिहास की कब्रों को कुरेदने जैसा होता है. विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी हो या मुगल सियासत का केंद्र रहा फतेहपुर सीकरी, मोहम्मद बिन तुगलक का बसाया शहर दौलताबाद हो या बाज बहादुर-रूपमती के प्रेम की गवाही देता मांडू, बेतवा किनारे बुंदेलों द्वारा बसाया गया ओरछा हो या जैसलमेर की रेत में तपता हुआ कुलधरा गांव, वाणिज्य का केंद्र रहा लखपत हो या सुदूर दक्षिण तट पर बसा शहर धनुषकोडी, हादसों और हालात के हमलों ने इनकी मजबूत बुनियादें इस कदर हिला दीं कि आज इनकी पहचान ‘मौजा-बेचिराग’ से ज्यादा नहीं रही.
एकांत की चादर ओढ़े ये गैर-आबाद शहर आज अपनी गिरी हुई इमारतों और ढहे हुए किलों की सोहबत में रहने को मजबूर हैं. कल जिन बरामदों में महफिलें सजती थीं, आज वहां सिर्फ हवा की सायं-सायं गूंजती है. जिन दरबारों में हर आम-ओ-खास की सुनवाई होती थी, आज वही दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास जर्जर पड़े हुए हैं.
तारीख गवाह है कि ये शहर कभी शान-ओ-शौकत का गढ़ थे, हजारों बाशिंदों का घर थे, पर आज खंडहर हैं. दीवारों में बने ताक अब बेचिराग पड़े हैं और अंधेरों की बुनियादें गहरी हो गयी हैं. मगर इंसानी आबादियों से महरूम ये कूचे हैरिटेज की तख्ती थामे अब भी आनेवाले सैलानियों की बाट जोहते हैं.
हम्पी की सभ्यता का इतिहास सुनहरे अक्षरों से दर्ज हुआ, लेकिन आततायियों के हमलों ने इस खूबसूरत शहर को खंड-खंड कर दिया. आज भी यहां मंदिर, मंडप, महल सब ज्यों के त्यों मौजूद हैं, लेकिन आबादी सिर्फ काई लगी शिलाओं की ही बची है.
ऐसे ही शहंशाह अकबर ने बड़ी मुहब्बत से फतेहपुर सीकरी में लाल पत्थर से अपना गढ़ बसाया, मगर पानी की किल्लत के चलते मुगलिया सल्तनत को इस शहर से मुंह फेरकर जाना पड़ा.
ओरछा नगरी के ऐतिहासिक किले और मंदिर किसी परीकथा का सजीव चित्रण मालूम पड़ते हैं, मगर सियासी कारणों के चलते बुंदेलों को इस धरोहरनुमा शहर को निर्जन छोड़ना पड़ा. इसी तरह मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली छोड़ दौलताबाद को अपनी सियासी राजधानी बनाने के लिए कूच तो किया, मगर यह नया शहर उसे और उसकी आवाम को रास नहीं आया.
नतीजतन, दिल्ली दोबारा राजधानी बनायी गयी और पीछे छूट गया वीरान दौलताबाद शहर. गुजरात में सिंधु नदी के किनारे बसा शहर लखपत कभी व्यापार का केंद्र था, मगर 1819 के भूकंप के बाद सिंधु नदी ने अपना रास्ता बदला और नदी द्वारा होनेवाला व्यापार ठप्प पड़ा, तो शहर भी वीरान पड़ गया.
मांडू का हिंडोला महल, जहाज महल, बावड़ियां और हमाम उस दौर की शान-ओ-शौकत के प्रमाण हैं, मगर लोक-कथाओं के मुताबिक अकबर की मांडू पर चढ़ाई और रूपमती की खुदकुशी के बाद बाज बहादुर का हमेशा के लिए मांडू को छोड़ जाना ही इस नगरी की वीरानी का कारण बना.
राजस्थान में बसा कुलधरा गांव सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों जैसा दिखता है. यह गांव भी सालों से निर्जन पड़ा है, जबसे पालीवाल ब्राह्मण इस गांव को श्राप देकर छोड़ गये. रेत पर बाकी बचे धनुषकोडी के खंडहर गवाह हैं 1964 के चक्रवात के, जो इस शहर की सब रौनकें लील गया. आज भी बीते कल के निशान लिये यह शहर सुनसान खड़ा सैलानियों को स्मृतियों के सफर पर ले जाता है.
मानव को उसका ‘इतिहासबोध’ ही उसे मवेशियों से अलग बनाता है. इसलिए नीत्शे ने भी लिखा, ‘मवेशियों को देखो; वे नहीं जानते कि कल या आज का क्या मतलब है. वे इसी क्षण में जीते हैं.’ इतिहास के सबूत यह खंडहरनुमा शहर दो ताकतों का विरोधाभास है, दृढ़ता और विघटन (बका और फना). इन बियाबानों की बुनियाद में दफ्न बेशुमार किस्से-कहानियां हमें यही बोध कराती हैं कि समय ही सबसे शक्तिशाली है, जो वीराने को आबाद करने और बसे-बसाये शहरों को सुनसान बनाने की कुव्वत रखता है.
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