समय आ गया है कि निर्देशक नाट्य प्रस्तुति के लिए कविता की ओर रुख करें

Updated at : 09 Sep 2018 5:33 AM (IST)
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समय आ गया है कि निर्देशक नाट्य प्रस्तुति के लिए कविता की ओर रुख करें

भारतीय रंगमंच पर कविता को प्रस्तुत करने को लेकर उत्सुकता कम क्यों है? यथार्थवादी प्रस्तुति परिकल्पना ने अभी तक हमारे निर्देशकों की रंगभाषा को जकड़ा हुआ है. इसलिए कविता के मंचन की कोशिश भी होती है, तो परिकल्पना यथार्थवादी होता है. पिछले कुछ दिनों में देखी गयीं विदेशी प्रस्तुतिओं में जो सबसे शानदार थीं, कविताओं […]

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भारतीय रंगमंच पर कविता को प्रस्तुत करने को लेकर उत्सुकता कम क्यों है? यथार्थवादी प्रस्तुति परिकल्पना ने अभी तक हमारे निर्देशकों की रंगभाषा को जकड़ा हुआ है. इसलिए कविता के मंचन की कोशिश भी होती है, तो परिकल्पना यथार्थवादी होता है.

पिछले कुछ दिनों में देखी गयीं विदेशी प्रस्तुतिओं में जो सबसे शानदार थीं, कविताओं की मंचीय प्रस्तुतियां. जैसे थियेटर ओलंपिक्स में ही थिएडोरस टेरेजोपोलिस की प्रस्तुति ‘एन्कोर’ और यूजिनियो बार्बा की प्रस्तुति ‘द ग्रेट सिटीज अंडर दि मून’. ग्रीस के एटिस थिएटर की थियोडोरस टेरेजोपोलिस निर्देशित प्रस्तुति ‘एन्कोर’ उनके त्रयी ‘अलार्मे’ और ‘एमोर’ का हिस्सा थी. यह मूलतः कविता की प्रस्तुति थी, कविता थामस सैलातोपिस की है.
प्रस्तुति में एक अभिनेता और एक अभिनेत्री के दो शरीरों के माध्यम से प्रेम और इस प्रक्रिया में एक-दूसरे का उपभोग करने की, एक का दूसरे के भीतर विकसित होकर नष्ट करने की, एक-दूसरे से निकलने की, और दो देहों के एक-दूसरे पर वर्चस्व कायम करने और समर्पण करने की स्थितियों को अभिव्यक्त किया जा रहा था. अभिनेताओं का अनुशासन, तकनीक का नियंत्रण, ध्वनि, प्रकाश परिकल्पना ने इस प्रस्तुति को एक सार्थक रंगमंचीय अनुभव बनाया. मंच पर एक क्रॉस बनाया गया था, जो धार्मिक प्रतीक की भी अभिव्यक्ति कर रहा था
और अभिनेताओं की सारी गतिविधि इसी क्रास पर हुईं. देह की एक दूसरे के प्रति प्रतिक्रिया करते हुए और ‘एन्कोर एन्कोर एन्कोर’ दोहराते हुए अभिनेता शरीर से कभी तेज और कभी फुसफुसाहट में आवाज निकाल रहे थे, जो सघन सुर्रियल दृश्य प्रभाव निर्मित कर रही थी. वैसे नाट्य प्रस्तुति में एक्शन अहम होता है, लेकिन कविता में बहुधा नाटकीय एक्शन के अनुकूल स्थितियां नहीं मिलतीं, फिर भी कविता का पाठ के तौर पर प्रस्तुति में प्रयोग एक उत्तेजक अनुभव प्रदान करता है. ऐसा इसलिए कि रंगमंच का कविता से गहरा संबंध है.
रंगमंच या नाटक तो दृश्य काव्य ही है. दूसरी बात यह कि किसी भी रंग प्रस्तुति का कलात्मक लक्ष्य होता है कि वह कविता में बदल जाये. उसके बिंब इतने तरल और गहरे हों कि नाट्यभाषा काव्यभाषा की तरह संप्रेषित हो. जब किसी नाटक की दृश्यभाषा बतौर दर्शक हमें छूती है, तो हम कहते भी हैं कि प्रस्तुति कविता सरीखी थी. ऐसा इसलिए भी कि अब भी एक सार्थक कविता हृदय को सबसे सक्षमता से उद्वेलित करती है.
सवाल है कि भारतीय रंगमंच पर कविता को प्रस्तुत करने को लेकर उत्सुकता कम क्यों है? यथार्थवादी प्रस्तुति परिकल्पना ने अभी तक हमारे निर्देशकों की रंगभाषा को जकड़ा हुआ है, इसलिए कविता के मंचन की कोशिश भी होती है, तो परिकल्पना यथार्थवादी होता है, जिससे कविता के बिंब का सक्षम नाट्य भाषा में रूपांतरण नहीं हो पाता. कविता को मंच पर कई तरीकों से प्रस्तुत किया जा सकता है. समकालीन रंगकर्म में मनोशारीरिक रंगभाषा, न्यू मीडिया के इस्तेमाल से तैयार रंगभाषा का आजकल प्रचलन है और लिखित पाठ से परे जाकर नाट्य बिंब रचने की बात अक्सर निर्देशक करते हैं. कविता के पाठ में रंगभाषाओं की ये विविध संभावनाएं मौजूद हैं.
मंच पर ‘अंधेरे में’, ‘पटकथा’, ‘हरिजन गाथा’, ‘असाध्य वीणा’ इत्यादि जैसी लंबी कविताओं को प्रस्तुत करने की परंपरा हिंदी क्षेत्र में रही है. कविता का रंगमंच स्थापित करने की कोशिश भी हुई, लेकिन उल्लेखनीय काम कम हुआ है. यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि कुछ युवा निर्देशकों का रुझान साहित्य की अन्य विधाओं को मंच पर प्रस्तुत करने की ओर है और उन्होंने कहानियों, जीवनियों, रिपोर्टाज आदि को मंच पर प्रस्तुत किया है. इन प्रस्तुतियों में रंगभाषा का नया आयाम गढ़ने की कोशिश की गयी है,
लेकिन शायद उनका ध्यान नहीं गया कि जैसी रंगभाषा वे गढ़ने या पाने को कोशिश कर रहे हैं, उसमें कविता उनकी काफी मदद कर सकती है. हाल ही में वरिष्ठ निर्देशक सुनील शानबाग ने कविताओं पर आधारित एक प्रस्तुति तैयार की है. समय आ गया है कि कुछ और निर्देशक नाट्य प्रस्तुति के लिए कविता की ओर रुख करें.
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