अनाज पैकेजिंग में पुराने जूट के बोरों का इस्तेमाल
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :21 Mar 2017 8:54 AM
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कोलकाता: अनाज पैकेजिंग के लिए जूट के बोरो की कमी के मद्देनजर केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय पुराने जूट के बोरों में पैकेजिंग की अनुमति देने पर विचार कर रह है. इस बाबत मंगलवार को दिल्ली में केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्यान्न व जन वितरण मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रशांत त्रिवेदी की अध्यक्षता में बैठक होगी. बैठक में […]
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कोलकाता: अनाज पैकेजिंग के लिए जूट के बोरो की कमी के मद्देनजर केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय पुराने जूट के बोरों में पैकेजिंग की अनुमति देने पर विचार कर रह है. इस बाबत मंगलवार को दिल्ली में केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्यान्न व जन वितरण मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रशांत त्रिवेदी की अध्यक्षता में बैठक होगी. बैठक में आनाज पैकेजिंग में पुराने जूट के बोरों के इस्तेमाल की अनुमति दिये जाने की संभावना है. सरकारी मांग के अनुपात में जूट मिलें अभी तक 2.5 लाख गांठ बोरों की आपूर्ति नहीं कर पायी है तथा अप्रैल में और तीन लाख गांठ की जरूरत होगी. ऐसी स्थिति में जूट मिलें सरकारी मांग की आपूूर्ति करने में अक्षम है.
सरकार ने इसके पहले ही 4.75 लाख बोरों का विलय किया था तथा फिर विलय की संभावना जतायी जा रही थी. हाल में ही कोलकाता में आयोजित बैठक में केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी व खुद केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी ने भी चिंता जतायी थी. जूट उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी खाद्यान्नो की पैकेजिंग में पुराने बोरो के इस्तेमाल की अनुमति से तत्कालीन समस्या का तो समाधान हो जायेगा, लेकिन जूट उद्योग पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा. जूट पैकेजिंग मेटेरियल्स एक्ट 1987 में हालांकि कोई जिक्र नहीं है कि पैकेजिंग में केवल पुराने बोरों का इस्तेमाल करना है या नये बोरों का, लेकिन नये बोरों के इस्तेमाल का उल्लेख करने का प्रावधान रखा गया है. प्रस्ताव के अनुसार पुराने बोरे के इस्तेमाल के लिए भारतीय खाद्य निगम की अनुमति राज्य सरकार की एजेंसियों को लेनी होगी. पूरी परीक्षा के बाद ही पुराने बोरे के इस्तेमाल की अनुमति दी जायेगी. इस्तेमाल के रूप में 10 रुपये प्रति क्विंटल शुल्क भी निर्धारित करने का प्रस्ताव है.
जूट उद्योग के विशेषज्ञों के अनुसार जूट मिलों की हालत पहले से ही खराब है. अभी जूट मिलों को केवल प्लास्टिक उद्योग से सामना करना पड़ता था, लेकिन अब पुराने बोरों का भी एक बाजार बन जायेगा. उससे भी जूट उद्योग को सामना करना पड़ेगा. चूंकि पुराने जूट के बोरे उपलब्ध रहेंगे, इससे नये जूट के बोरे की मांग में कमी आयेगी और इसका सीधा प्रभाव जूट उद्योग के कारोबार पर पड़ेगा और अंतत: इससे जूट श्रमिक प्रभावित होंगे. उनका कहना है कि जब जूट बोरे की मांग घटेगी, तो जूट किसान भी इससे प्रभावित होंगे तथा उन्हें भी अपेक्षाकृत कम कीमतें मिलेंगी.
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