लोगों के सहयोग से चल रही है राज परिवार की दुर्गा पूजा, राजा की मर्यादा को आज भी बचाए हुए हैं ग्रामवासी

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मालदा. राजा का राज नहीं है, लेकिन तीन सौ वर्ष पहले राजाओं द्वारा शुरू की गयी दुर्गापूजा पहाड़पुर गांव के मंदिर में आज भी बड़े हर्षोल्लास के साथ होती है. गांव के इस मंदिर में देवी दुर्गा के चतुर्भुजी चंडी स्वरूप का पूजन किया जाता है. इस पूजा के आर्थिक भार का एक हिस्सा चांचल […]

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मालदा. राजा का राज नहीं है, लेकिन तीन सौ वर्ष पहले राजाओं द्वारा शुरू की गयी दुर्गापूजा पहाड़पुर गांव के मंदिर में आज भी बड़े हर्षोल्लास के साथ होती है. गांव के इस मंदिर में देवी दुर्गा के चतुर्भुजी चंडी स्वरूप का पूजन किया जाता है. इस पूजा के आर्थिक भार का एक हिस्सा चांचल ऑफिशियल ट्रस्ट बोर्ड उठाता है और बाकी बोझ ग्रामवासी वहन करते हैं.
ग्राम वासियों का कहना है कि ट्रस्ट बोर्ड के रुपयों से पूजा ठीक तरह से नहीं की जा सकती. ग्रामवासियों के समक्ष राज परिवार की एक अलग ही मर्यादा है जिसे बचाये रखने के लिए सभी ग्रामवासी सहयोग करते हैं. चांचल राजमहल से एक किलोमीटर दूर पहाड़पुर गांव में राजघराने द्वारा देवी दुर्गा का मंदिर बनाया गया था जहां सिंह पर विराजमान मां चंडी की मूर्ति स्थापित है. प्रत्येक वर्ष इसी मूर्ती को सामने रख कर एक मिट्टी की मूर्ति तैयार की जाती है जिसे दशमी के बाद विसर्जित कर दिया जाता है. बोर्ड के सुपरवाइजर पिनाकी जय भट्टाचार्य ने बताया कि पहाड़पुर व मालतीपुर गांव के लोग आज भी राजा द्वारा शुरू की गयी यह दुर्गापूजा बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं. पहाड़पुर पूजा कमिटी के सचिव अचिंत मित्र ने बताया कि महाअष्टमी को कुमारी पूजन देखने के लिए भक्तों की भीड़ इकट्ठा होती जिसमें विभिन्न प्रांत से आये हुए साधु, संन्यासी भी शामिल होते हैं. पूजा के चारों दिन देवी को खिचड़ी का भोग लगा कर भक्तों में वितरित किया जाता है. राजा के एक मात्र पुत्र स्वर्ग सिधार चुके हैं एवं बेटियों का वंश पूजा में रुचि नहीं दिखाता है. पूजा के लिए ट्रस्ट द्वारा दिये गये एक या डेढ़ हजार रुपये से पूजा करना संभव नहीं. इसलिए ग्रामवासियों की आर्थिक सहायता से इस पूजा को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है.
दुर्गापूजा शुरू करने का सपना आया था
कहा जाता है कि चांचल के राजा शरतचंद्र राय चौधरी के पितामह रामचंद्र राय चौधरी को पहाड़पुर गांव की महानंदा नदी में स्नान करते समय पत्थर की बनी, सिंह पर विराजमान देवी की एक मूर्ती मिली थी. इसके बाद राजघराने के सदस्य को स्वप्न में देवी ने चंडी रूप में दर्शन दिया था. स्वप्न में देवी के निर्देशानुसार ही राजपरिवार ने दुर्गापूजा करना शुरू किया था. यह परंपरा गांववाले आज भी निभा रहे हैं.
श्री भट्टाचार्य ने बताया कि सप्तमी के दिन राजा को मिली काली पत्थर की उस मूर्ति को पंचवाद्य के साथ पीतल के छाते की छांव में राजमहल से पहाड़पुर गांव के मंदिर में लाया जाता है. किसी समय सप्तमी की संधिपूजा के दिन कमान दागी जाती थी, लेकिन अब वह प्रथा इतिहास बन चुकी है. दशमी के दिन सूर्य के अस्त होने से पहले ही देवी को विसर्जित कर दिया जाता है.
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