यहां आज भी चावल देकर खरीदी जाती हैं सब्जियां
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 05 Dec 2019 2:01 AM
अदला बदली : आज भी चल रही है विनिमय की पुरातन प्रथा पैसे के बदले सामान लेते हैं भूटानी कारोबारी नागराकाटा : आटा के बदले ताजा कुमड़ा, एक पावा चाय पत्ती के बदले फूल झाड़ू और चावल के बदले में संतरा. नागराकाटा ब्लाक के भारत भूटान सीमा पर स्थित जिति बागान में लगनेवाले हाट में […]
अदला बदली : आज भी चल रही है विनिमय की पुरातन प्रथा
पैसे के बदले सामान लेते हैं भूटानी कारोबारी
नागराकाटा : आटा के बदले ताजा कुमड़ा, एक पावा चाय पत्ती के बदले फूल झाड़ू और चावल के बदले में संतरा. नागराकाटा ब्लाक के भारत भूटान सीमा पर स्थित जिति बागान में लगनेवाले हाट में आज भी विनिमय की पुरातन प्रथा ही चल रही है. इस हाट पर बिना रसायनिक खाद और कीटनाशक के जैविक रूप से की गयी खेती के उत्पाद की खास मांग रहती है. जैविक सब्जियों के लिए लोगों की यहां काफी भीड़ रहती है.
गौरतलब है कि जिति चाय बागान स्थित भूटान सीमा पर किसी प्रकार की रोक टोक नहीं है. यही कारण है कि इस हाट पर भूटान के किसान अपने उत्पाद को आराम से लेकर आते हैं और बेच कर वापस जाते हैं. इसी प्रकार भारत के लोग भी इस बागान के रास्ते आराम से भूटान आ जा सकते हैं, लेकिन अन्य दिनों की तुलना में हाट लगने के दिन लोगों की आवाजाही अधिक रहती है.
जिति चाय बागान से थोड़ी देरी पर लगनेवाले इस बाजार में ज्यातर महिला व्यापारी ही रहती हैं. भूटान की एक महिला व्यापारी कहती है कि कई घंटों की दूरी तय कर वो लोग अपना उत्पाद यहां बिक्री के लिए लाती हैं. ये महिलाएं भूटान से माथा और पीठ पर लाद कर अदरक, पाहड़ी गाय का घी, फूल झाडू से लेकर साग-सब्जी तक लाती है.
वो कहती है कि सब्जियों में जैसे कुमड़ा, राई साग, करेला, लौकी,धनिया पत्ता, फुलकोबी, इस्कुश आदि की मांग यहां ज्यादा है. यहां अपना उत्पाद बेचकर ये महिलाएं यहां से दाल, चावल सहित कई अन्य जरुरी सामान लेकर भूटान लौट जाती है.
लोगों का कहना है कि इस हाट पर भारतीय मुद्रा ही चलता है, लेकिन कई चाय श्रमिकों के पास पैसा नहीं रहता है कि वो सब्जी अथवा अन्य घर में उपयोग करनेवाले सामान खरीद सके. ऐसे में यहां भूटानी व्यपारियों को आंटा, चावल देकर उसके बदले में सब्जी खरीदा जाता है. भूटानी व्यापारियों ने कहा कि हमें अपने घर के लिए नून, तेल, चावल, आंटा, चाय पत्ती खरीदना पड़ता है. यहां जो पैसा नहीं देते हैं हम उनसे यही सामान ले लेते हैं. ऐसा वर्षों से होता आ रहा है.
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