देवी को नहीं भाती है सूर्य की रोशनी, कहलाती असूर्यस्पर्शा, एक रात में निर्मित व पूजा बाद होती हैं काली मूर्ति विसर्जित

Updated at : 05 Nov 2018 5:33 AM (IST)
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देवी को नहीं भाती है सूर्य की रोशनी, कहलाती असूर्यस्पर्शा, एक रात में निर्मित व पूजा बाद होती हैं काली मूर्ति विसर्जित

बालुरघाट : मां काली की पूजा वैसे तो देश के विभिन्न हिस्सों के साथ बंगाल में अत्यंत उल्लास के साथ की जाती है. लेकिन दक्षिण दिनाजपुर जिले के तपन ब्लॉक के दूर दराज के भिकाहार इलाके में एक पूजा ऐसी भी होती है जो एक ही रात में संपन्न की जाती है. यहां सूर्यास्त के […]

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बालुरघाट : मां काली की पूजा वैसे तो देश के विभिन्न हिस्सों के साथ बंगाल में अत्यंत उल्लास के साथ की जाती है. लेकिन दक्षिण दिनाजपुर जिले के तपन ब्लॉक के दूर दराज के भिकाहार इलाके में एक पूजा ऐसी भी होती है जो एक ही रात में संपन्न की जाती है. यहां सूर्यास्त के बाद ही मंदिर परिसर में देवी मां की मूर्ति का निर्माण शुरु होता है और अगली सुबह के पहले पूजा अनुष्ठान संपन्न कर उन्हें विसर्जित भी कर दिया जाता है.
अर्थात मां काली को सूर्य की रोशनी नहीं लगने दी जाती जिससे उनका नाम असूर्यस्पर्शा काली कहा गया. यह पूजा तांत्रिक पद्धति से की जाती है. रविवार को इस पूजा को लेकर तैयारी अपने अंतिम चरण में है.
जनश्रुति है कि इसी स्थान पर सैकड़ों साल पहले एक तांत्रिक साधक मां काली की साधना करते थे. उन्होंने एक बार अपनी नाबालिग बेटी को जीवित दफन कर उसकी मिट्टी पर देवी मां की प्रतिमा स्थापित कर दी. उनकी बेटी का नाम मंदिरा था. उसी के नाम पर इस मंदिर का नाम मंदिरवासिनी पड़ा. उसके बाद करीब तीन सौ साल पहले संयुक्त दिनाजपुर जिले के एक जमींदार ने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया.
यहां की पूजा में महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है. इसीलिये यहां के पूजा अनुष्ठान में केवल पुरुष ही शामिल होते हैं. पूजा के लिये पाठे की बलि दी जाती है. इस काली पूजा की पवित्रता और किंवदंती के अनुसार दूर-दूर से लोग यह पूजा देखने आते हैं. उल्लेखनीय है कि काफी दिनों से इस मंदिर की देखरेख सही तरीके से नहीं होने से मंदिर जीर्ण शीर्ण अवस्था में है. इसके बावजूद यहां आने वाले भक्तों की भीड़ देखने लायक होती है.
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