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चयन की प्रक्रिया भाई-भतीजावाद और पक्षपात से ग्रस्त, पारदर्शिता की है कमी

Updated at : 04 May 2024 12:48 AM (IST)
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चयन की प्रक्रिया भाई-भतीजावाद और पक्षपात से ग्रस्त, पारदर्शिता की है कमी

काजी नजरूल विश्वविद्यालय (केएनयू) में वर्ष 2019 में डेवलपमेंट प्लानिंग ऑफिसर (डीपीओ) के पद पर बहाली को रद्द करने के साथ पूरी चयन प्रक्रिया को ही रद्द करने का निर्देश कलकत्ता उच्च न्यायालय के एकल पीठ के न्यायाधीश कौशिक चंद्रा ने दिया

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वर्ष 2019 में डीपीओ पद पर बहाली के लिए निकली थी विज्ञप्ति, 56 उम्मीदवारों ने किया था आवेदन अंतिम समय में 10 वर्ष के अनुभव का घटाकर किया गया तीन वर्ष, इसके बावजूद भफिट नहीं बैठे उम्मीदवार को दी गयी नौकरी आसनसोल. स्कूल सर्विस कमीशन (एसएससी) के बाद विश्वविद्यालयों में भी नौकरी में धांधली का खुलासा होना शुरू हो गया है. काजी नजरूल विश्वविद्यालय (केएनयू) में वर्ष 2019 में डेवलपमेंट प्लानिंग ऑफिसर (डीपीओ) के पद पर बहाली को रद्द करने के साथ पूरी चयन प्रक्रिया को ही रद्द करने का निर्देश कलकत्ता उच्च न्यायालय के एकल पीठ के न्यायाधीश कौशिक चंद्रा ने दिया. उन्होंने अपनी राय में साफ शब्दों में कहा कि चयन की प्रक्रिया भाई-भतीजावाद से ग्रसित है और पारदर्शिता की भारी कमी है. इस राय के बाद से केएनयू में हलचल काफी तेज हो गयी है. केएनयू के रजिस्ट्रार डॉ. चंदन कोनार ने कहा कि डीपीओ महेश्वर मालो दास के खिलाफ अदालत के निर्देश का पालन करने का कार्य शुरू हो गया है. उनके पास प्रतिष्ठान का जो भी समान है, यदि कुछ अग्रिम राशि ली हो, सभी की सूची तैयार की जा रही है. सारे सामान उनसे जल्द संग्रह कर अदालत के निर्देश पर उन्हें टर्मिनेट किया जायेगा, जिसके लिए प्राथमिक नोटिस भी उन्हें दे दिया गया है. श्री दास से इस विषय में जानने के लिए अनेकों बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं पकड़ा. सूत्रों के अनुसार इस घटना के बाद केएनयू में कुछ अन्य पदों पर भी नियुक्तियों में हुई धांधली को लेकर अदालत में चुनौती देने की तैयारी शुरू हो गयी है. गौरतलब है कि 13 जनवरी 2019 को केएनयू में डीपीओ पद पर बहाली के लिए विज्ञप्ति जारी हुई थी. जिसके आधार को कुल 56 उम्मीदवारों ने इस पद के लिए आवेदन किया था. जिसमें से महेश्वर मालो दास का चयन हुआ. इस चयन में धांधली का आरोप लगाते हुए चयन की प्रक्रिया के खिलाफ दो लोगों ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में रीट पिटीशन दायर की. जिसमें से एक गोपाल कृष्ण झा और दूसरे असीम कुमार विश्वास हैं. कुल दस को प्रतिवादी बनाया गया. चार वर्षों तक मामले में सुनवाई चलने के बाद आखिरकार अदालत ने अपना फैसला सुनाया, जिससे उच्च शिक्षा में होनेवाली नियुक्तियों में भी धांधली का खुलासा हुआ.

विज्ञप्ति में जारी योग्यता को घटाया गया, इसके बावजूद भी नहीं उतरे खरे

न्यायाधीश कौशक चंद्रा की राय में कहा है कि इस पद के लिए जो योग्यताएं निर्धारित थीं उसमें उम्मीदवार का अकादमिक रिकॉर्ड समान रूप से अच्छा होना, मास्टर डिग्री में न्यूनतम 55 फीसदी अंक या इसके समकक्ष डिग्री हो. जहां भी ग्रेडिंग प्रणाली का पालन किया जाता है, वहां प्वॉइंट स्केल के समकक्ष ग्रेड हो. कॉलेज, विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षा संस्थान सरकारी या अर्ध सरकारी संगठन के प्रशासन के पर्यवेक्षक, नियंत्रण और योजना से संबंधित पद पर कम से कम दस वर्ष का अनुभव होना. आयु 35 वर्ष से कम न हो और असाधारण रूप से योग्य उम्मीदवारों के मामले में छूट देने का प्रावधान था. 56 उम्मीदवारों ने आवेदन किया. जिसमें 10 उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया. जिसमें प्रतिवादी संख्या सात (महेश्वर मालोदास) को इस पद पर नियुक्त किया गया. दो रीट में याचिकाकर्ताओं ने प्रतिवादी सात के योग्यता से जुड़े जो कागजता जमा किया उस पर प्रतिवादी ने कोई विवाद नहीं किया. प्रतिवादी सात की जो योग्यता थी, उसमें माध्यमिक में 65.25 प्रतिशत, उच्च माध्यमिक में 42.2 प्रतिशत, स्नातक में 41.12 प्रतिशत और मास्टर डिग्री में 59.15 फीसदी अंक प्राप्त किया. यह समान रूप से अच्छा अकादमिक रिकॉर्ड है या नहीं? इसपर सवाल खड़ा हुआ. 10 वर्ष अनुभव के मामले में प्रतिवादी सात के पास एनआइसीईडी संस्था में ठेका पर 16 दिसंबर 2002 से 31 जुलाई 2014 तक, विद्यासागर विश्वविद्यालय में जूनियर असिस्टेंट सह टाइपिस के पद पर 14 फरवरी 2014 से दो सितंबर 2015 तक, जूनियर असिस्टेंट के पद पर केएनयू में तीन सितंबर 2015 से 15 जनवरी 2019 तक, अकाउन्ट्स ऑफिसर के पद पर नॉर्थ बंगाल विश्वविद्यालय में 16 जनवरी 2019 से 18 जनवरी 2019 तक के कार्य का अनुभव था. विज्ञप्ति के आधार पर उनके पास दस साल का अनुभव नहीं था. शॉर्टलिस्टिंग के उद्देश्य से स्क्रीनिंग कमेटी ने शैक्षणिक योग्यता मास्टरडिग्री में न्यून्तन प्राप्त अंक 55 फीसदी को बढ़ाकर 60 फीसदी कर दिया और अनुभव मानदंड को 10 वर्ष से घटाकर तीन वर्ष कर दिया. यह भी सवालों के घेरे में आ गया. प्रतिवादी संख्या सात को अंतिम चयन पूल में शामिल करने के लिए आ अनुभव के मानदंड में ढील दी गयी. अनुभव के आधार पर वह शॉर्टलिस्ट होने के योग्य नहीं था और उसके पास मास्टरडिग्री में 60 फीसदी अंक भी नहीं थे. अदालत ने यह भी पाया कि प्रतिवादी सात शॉर्टलिस्टिंग की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभायी थी. परीक्षा में प्राप्त नम्बर पर भी अदालत ने आश्चर्य प्रगट किया. पीएचडी की डिग्री नहीं होने के बावजूद भी उसे इसमें पांच नम्बर मिला. सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ज्ञान के आधार पर 10 में से नौ अंक मिला. जबकि उनके पास कोई औपचारिक शैक्षणिक योग्यता नहीं थी. डोमेन ज्ञान और साक्षात्कार में 40 में 36 अंक दिया गया. इस प्रकर 79.9 अंकों के साथ प्रतिवादी सात का प्रथम स्थान अर्जित किया. न्यायाधीश ने अपनी राय में कहा प्रतिवादी सात के पास चयन प्रक्रिया में भाग लेने के लिए आवश्यक बुनियादी योग्यताएं नहीं थी. सरासर हेरफेर और कदाचार के द्वारा उन्हें संबंधित पद पर नियुक्त किया गया था. केएनयू में डीपीओ के पद के लिए सम्पूर्ण चयन प्रक्रिया को रद्द किया जाता है, चूंकि पूरी चयन प्रक्रिया भाई-भतीजावाद, पक्षपात से ग्रस्त है और पारदर्शिता की कमी है. इसलिए अदालत यह राय देती है कि प्रतिवादी सात की नियुक्ति रद्द करने के साथ पूरी चयन प्रक्रिया को भी रद्द करना चाहिए.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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