बंगाली भद्रलोक ने लोस चुनाव में बदला चोला, हुए ‘लाल’ से ‘गेरुआ’

Updated at : 27 May 2019 2:02 AM (IST)
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बंगाली भद्रलोक ने लोस चुनाव में बदला चोला, हुए ‘लाल’ से ‘गेरुआ’

अजय विद्यार्थी : पश्चिम बंगाल के संसदीय इतिहास में पहली सात चरणों में हुआ लोकसभा चुनाव देश की राजनीति के केंद्र विंदु में रहा. तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घोर विरोधी सुर, मतदान के दौरान हिंसा, सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो […]

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अजय विद्यार्थी : पश्चिम बंगाल के संसदीय इतिहास में पहली सात चरणों में हुआ लोकसभा चुनाव देश की राजनीति के केंद्र विंदु में रहा. तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घोर विरोधी सुर, मतदान के दौरान हिंसा, सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हंगामा और विद्यासागर की मूर्ति का टूटना और अंतत: चुनाव परिणाम ने बंगाल को दो माह के लंबे चुनावी कार्यक्रम में सुर्खियों में रखा.

कभी पश्चिम बंगाल में अछूत मानी जाने वाली भाजपा ने राजनीतिक पंडितों को चौंकाते हुए लोस चुनाव में धमाकेदार उपस्थिति दर्ज की और देश के साथ-साथ पश्चिम बंगाल में भी मोदी मैजिक सिर चढ़ कर बोला.

2009 के बाद राजनीतिक करवट
2009 के बाद बंगाल की राजनीति ने फिर से करवट ली है. इस चुनाव में राज्य की कुल 42 सीटों में से भाजपा का आंकड़ा दो सीटों से बढ़ कर 18 हो गया, जबकि तृणमूल कांग्रेस की सीटों की संख्या 34 से घट कर 22 और कांग्रेस के सीटों की सं‍ख्या चार से घट कर दो हो गयी है. चुनाव में वामपंथी पार्टियों का राज्य से पूरी तरह से न केवल सफाया हो गया, वरन 42 में से केवल एक लोकसभा सीट पर अपनी जमानत बचा पायी है.
भाजपा ने न केवल 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की है, वरन 22 सीटों पर नंबर दो भी रही है. 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में 129 विधानसभा सीटों पर भाजपा ने सीधी जीत हासिल की है. इस जीत के साथ ही भाजपा 2021 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में ‘सीएम इन वेटिंग’ का दर्जा हासिल कर लिया है.
गौरतलब है कि 2009 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के शासनकाल में लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं और वाम मोर्चा को 15 सीटें. इसी चुनाव से ही वाम मोर्चा की राज्य की राजनीति पर पकड़ ढ़ीली पड़ने लगी थी और इसी जनाधार के बल पर 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन को उखाड़ फेंकने में सफल रही थी.
ममता की मां, माटी,मानुष शासन की शुरुआत हुई थी. इस लोकसभा चुनाव में भाजपा की राज्य की 18 सीटों पर जीत के बाद फिर राज्य में 2009 की ही स्थिति उत्पन्न हुई है. अंतर केवल इतना है इस बार किला बचाने की चुनौती वाम मोर्चा की जगह ममता को है.
चौंकाने वाले साबित हुए चुनाव नतीजे
2019 का बंगाल का लोकसभा चुनाव परिणाम कई मायने में चौंकाने वाला साबित हुआ. 2011 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा के पराजय के बाद लोकसभा चुनाव, 2014 और विधानसभा चुनाव, 2016 और नगरपालिका व पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की विजय यात्रा जारी रही थी, लेकिन लगातार जीत ने ‘बदला नॉय बदल चाई’ के नारे के साथ सत्ता में आयी तृणमूल के चरित्र को बदल दिया.
वामपंथी कैडर, भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने तृणमूल कांग्रेस पर अत्याचार के आरोप लगाने शुरू कर दिये थे. वामपंथी विचारधारा वाले लोगों को रक्षा कवच उपलब्ध कराने में लगातार कमजोर होती वामपंथी पार्टियां असफल हो रही थी. इस लोकसभा चुनाव में इसका प्रतिफलन दिखा.
2014 के लोकसभा चुनाव में वामपंथी पार्टियों को 29.71 फीसदी मत मिले थे, जबकि भाजपा को मात्र 17.02 फीसदी मत मिले थे, लेकिन 2019 के चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ कर 40.25 फीसदी हो गया, जबकि वाम मोर्चा का मत प्रतिशत घट कर 7.46 फीसदी हो गया. साफ है कि कभी वामपंथी विचारधारा वाले मतदाताओं ने भाजपा के समर्थन में वोट दिया.
दलित वोटों में सें‍धमारी, बिगाड़ा टीएमसी का गणित
प बंगाल में 30% मुस्लिम और 23.5% (अजा-अजजा) की आबादी के समर्थन के बल पर वाम मोर्चा ने 34 सालों तक और तृणमूल कांग्रेस 2011 से लगातार जीत हासिल करती रही थी, लेकिन यह चुनाव न केवल मुस्लिम वोटों के खिलाफ हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ, वरन मुस्लिम-दलित वोटों के गढ़ में भी भाजपा छिद्र करने में सफल रही.
भाजपा मुस्लिम-दलित बहुल कुल 10 सीटों में से पांच सीटें कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, बनगांव, रानाघाट और विष्णुपुर जीतने में सफल रही ही. साथ ही जयनगर, मथुरापुर, बोलपुर व बर्दवान पूर्व में भी उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है. इन सीटों पर लगभग 20% मुस्लिम आबादी भी है.
पीएम मोदी और अमित शाह द्वारा एनआरसी और नागरिकता कानून लागू करने जैसे वादों से दलित समुदाय मतुआ (नमोशुद्र का संप्रदाय), राजवंथी, कामतापुरी, गोरखा व बांग्लादेशी शरणार्थी भाजपा के पक्ष में आये और पीएम के ‘चुपे चाप, फूले छाप’ के नारे को अपना कर कर हिंसा के बीच भी भाजपा के पक्ष में वोट डाले.
टीएमसी : अपने किले को बचाना होगी चुनौती
अगले वर्ष नगरपालिका चुनाव और विधानसभा चुनाव, 2021 के पहले तृणमूल कांग्रेस को अपने किले बचाने की चुनौती है. चुनाव के पहले मुकुल राय, अर्जुन सिंह, नीशिथ प्रमाणिक जैसे तृणमूल नेता भाजपा में शामिल होकर पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया है. प्रधानमंत्री ने भी चुनावी रैलियों में संकेत दिया था कि तृणमूल कांग्रेस के 40 विधायक उनके संपर्क में हैं.
जिस तरह से भाजपा ने चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के समक्ष कड़ी चुनौती पेश की है. उससे तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं में निकट भ‍विष्य में भगदड़ मचने की संभावना है. तृणमूल कांग्रेस की इन नेताओं को रोकने के साथ-साथ जिन सीटों पर भाजपा ने जीत या बढ़त हासिल की है. उन पर फिर से अपनी बढ़त बनाने की चुनौती होगी.
चुनाव बाद भी हिंसा का क्रम जारी
पश्चिम बंगाल में चुनाव के पूर्व शुरू हुई हिंसा चुनाव के बाद भी जारी है. मतदान बंगाल हिंसा के कारण सुर्खियों में छाया रहा था. चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने के बाद भी भाटपाड़ा के कांकीनाड़ा, राणाघाट, बर्दवान सहित अन्य इलाकों में हिंसा जारी है.
कई इलाकों से भाजपा और तृणमूल समर्थकों के बीच भिड़ंत और मारपीट की खबरें लगातार आ रही हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगले वर्ष प्रस्तावित नगरपालिका चुनाव और 2021 में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हिंसा की आग और भड़केगी और राज्य की राजनीति में अस्थिरता आयेगी.
पश्चिम बंगाल में कुल लोकसभा सीटें- 42
2019 : चुनाव परिणाम
तृणमूल कांग्रेस 22
भाजपा 18
कांग्रेस 02
वाम मोर्चा 00
2014 : चुनाव परिणाम
तृणमूल कांग्रेस 34
भाजपा 02
वाम मोर्चा 02
कांग्रेस 04
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