325 वर्ष पुरानी है मुखर्जी परिवार की दुर्गापूजा

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स्वप्नमयी मां दुर्गा के दर्शन को हजारों भक्त पहुंचते हैं सवाई गांव दी जाती है भैंसे की बलि, देखने उमड़ती है भारी भीड़ पानागढ़. पूर्व बर्दवान िजले के आउसग्राम दो ब्लॉक के तहत सवाई गांव में मुखर्जी परिवार की दुर्गापूजा आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र है.325 वर्ष पुरानी मुखर्जी परिवार की दुर्गापूजा देखने […]

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स्वप्नमयी मां दुर्गा के दर्शन को हजारों भक्त पहुंचते हैं सवाई गांव
दी जाती है भैंसे की बलि, देखने उमड़ती है भारी भीड़
पानागढ़. पूर्व बर्दवान िजले के आउसग्राम दो ब्लॉक के तहत सवाई गांव में मुखर्जी परिवार की दुर्गापूजा आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र है.325 वर्ष पुरानी मुखर्जी परिवार की दुर्गापूजा देखने के लिये हजारों की संख्या में भक्त एकत्रित होते हैं. स्वप्नमयी मां दुर्गा के नाम से परिचित मुखर्जी परिवार की दुर्गा प्रतिमा तथा यहां होने वाले अनुष्ठानों को लेकर काफी चर्चा रहती है.
बताया जाता है कि बर्दवान बाकल सार गांव से 330 वर्ष पूर्व वासुदेव मुखर्जी सवाई गांव की एक पाठशाला में विद्या अर्जन के वासुदेव मुखर्जी यहां आये थे. विद्यार्जन के दौरान ही गांव के कुलीन परिवार की कन्या से विवाह कर वहीं बस गये. परिवार के लोगों का कहना है कि बासुदेव को एक रात सपने में मां दुर्गा ने दर्शन देकर कहा कि वह अपने पैतृक गांव से उन्हें सवाई गांव लेते आये.
वासुदेव मुखर्जी अपने चार भाइयों के साथ बाकल सार गांव से मां दुर्गा की प्रतिमा को पालकी में बैठाकर सवाई गांव की तरफ आ रहे थे. इसी बीच रास्ते में बर्दवान के तत्कालीन राजा नगर परिक्रमा को िनकले थे. चारों भाइयों को रास्ते में देख सैनिकों ने अविलंब उन्हें हट जाने का आदेश दिया. इस पर चारों भाई अड़ गये.थोड़ी देर बाद जब महाराज स्वयं भाइयों के पास पहुंचे तो भाइयों ने महाराज से सारी घटना बतायी.
इसके बाद स्वयं महाराजा ने उनके लिये रास्ता छोड़ दिया तथा सैनिकों को आदेश दिया कि इन्हें कहीं भी रास्ते मे कोई असुविधा नहीं होनी चाहिये. गांव पहुंचने के बाद वासुदेव मुखर्जी ने मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की और यहां पर दुर्गापूजा आरंभ हो गयी. दुर्गापूजा को लेकर यहां कई अनुष्ठान व कार्यक्रम होते आ रहे हैं.
मुख्य आकर्षण का केंद्र यहां मुखर्जी परिवार द्वारा भैंसे की बलि है. परंपरागत रूप से यह अब तक होती आ रही है. पहले दो भैंसों की बलि होती थी लेकिन एक बार एक भैंसे की बलि के पूर्व ही मृत्यु होने के बाद से एक ही भैंसे की बलि होती है. पािरवािरक सूत्रों ने बताया िक तत्कालीन िब्रटिश सरकार ने भैंसों की बलि को लेकर मुखर्जी परिवार को कड़ी चेतावनी दी थी. लेिकन तत्कालीन अधिकारी को मां दुर्गा ने स्वप्न िदखाकर उन्हें विचिलत कर दिया था.
अंग्रेज अधिकारी ने अगले दिन ही मुखर्जी परिवार से आकर क्षमा याचना की तथा भैंसे की बलि को जारी रखने का आदेश दिया. तब से लेकर आज तक गांव में भैंसे की बलि दुर्गापूजा के समय जारी है. भैंसे की बलि देखने के लिये तथा मां के दर्शन को लोग एकत्रित होते हैं. आज भी प्राचीन रीतिरिवाज के अनुसार ही पूजा-अर्चना होती है.
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