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मां कात्यायनी और स्कंदमाता की पूजा एक ही दिन, वाराणसी में भक्तों की जयकारे से गूंजे मंदिर

मां स्कंदमाता रूपी बागेश्वरी को विद्या की देवी माना जाता है. इसी लिए यहा छात्र भक्तो की खासी भीड़ रहती है. वहीं शारदीय नवरात्र के छठे दिन षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी के दर्शन- पूजन की मान्यता है. यह मंदिर चौक स्थित संकठा मन्दिर के पीछे है

By Prabhat Khabar Digital Desk, Varanasi
Updated Date
वाराणसी में भक्तों की जयकारे से गूंजे मंदिर
वाराणसी में भक्तों की जयकारे से गूंजे मंदिर
Prabhat khabar

शारदीय नवरात्र में इस बार तिथि 8 दिनों की होने के वजह से भक्तों द्वारा पांचवे दिन मां स्कंदमाता और मां कात्यायनी के दर्शनों के लिए काशी के दोनो मंदिरों में लंबी लाइन लगी है. वाराणसी में मां स्कंदमाता बागेश्वरी देवी के रूप में जैतपुरा स्थान पर विद्यमान है. यहां मां स्कंदमाता का बागेश्वरी रूपी भव्य मंदिर मंदिर अति प्राचीन है. रात्री से ही यहां मां के दर्शनों के लिए भक्तो की भीड़ उमड़ पड़ती है.

मां स्कंदमाता रूपी बागेश्वरी को विद्या की देवी माना जाता है. इसी लिए यहा छात्र भक्तो की खासी भीड़ रहती है. वहीं शारदीय नवरात्र के छठे दिन षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी के दर्शन- पूजन की मान्यता है. यह मंदिर चौक स्थित संकठा मन्दिर के पीछे है. विवाह सम्बन्धी समस्याओं को लेकर यहाँ भक्तगणों की लंबी लाइन लगती हैं.

नवरात्र के पँचम और षष्ठी तिथि के दिन माँ स्कंदमाता और कात्यायनी देवी के दर्शनो के लिए प्रातःकाल से भक्तों की भीड़ मंदिरों में उमड़ी पड़ी है. मां स्कंदमाता अपने दिव्य भव्य स्वरुप में जैतपुरा स्थान पर स्थित है. वाराणसी का स्कन्द माता बागेश्वरी रूपी दुर्गा मंदिर सैकड़ो वर्षो से भक्तों की आस्था का केंद्र रहा है. शारदीय नवरात्र में इनके दर्शनों का विशेष महत्व है. इसी समय भक्त मां के दर्शनों व पूजन करते है और माँ स्कंदमाता रूपीबागेश्वरी जी उनकी मनोकामना पूर्ण करती है.

कोई अपने लिए विद्या मांगता है तो कोई नौकरी मांगत है और माँ भी अपने भक्तो की कामना पूर्ण करती है. यहां मां को नारियल और चुनरी के साथ गुडहल की माला और मिष्ठान चढ़ाने का विशेष महत्व है. जिससे माँ अपने भक्तो को सदबुद्धि व विद्या के अनुरूप वरदान देती है।

शारदीय नवरात्र की षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी के दर्शन- पूजन की मान्यता है. यह मंदिर चौक मन्दिर पर माता संकटा मन्दिर के पीछे स्थित है. देवी के बारे में कथा प्रचलित है कि कत नामक एक प्रसिपस्या पर उनकी इच्छानुसार भगवती उनकी पुत्री के रूप में प्राकट्य हुई. अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्मी भगवती ने शुक्ल पक्ष की सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी तक ऋषि कात्यायन की पूजा ग्रहण की और दशमी के दिन महिषासुर का वध किया था.

इनका स्वरूप अत्यन्त भव्य एवं दिव्य है. भगवती चार भुजाओं वाली हैं. एक हाथ वर मुद्रा दूसरा अभय मुद्रा में है. तीसरे हाथ में कमल पुष्प और चौथे हाथ में खड्ग सुशोभित है. मां सिंहारूढ़ा हैं. जो साधक मन, वचन एवं कर्म से मां की उपासना करते हैं उन्हें वे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के फल प्रदान करती हैं और शत्रु का विनाश कर भय से मुक्ति दिलाती हैं, जिन कन्याओं के विवाह समय से नहीं हो रहे हैं, या विवाह में अनेक अड़चनें आ रही हैं उन्हें देवी के इसी स्वरूप का दर्शन करना चाहिए. इनका मंदिर चौक स्थित संकठा मंदिर के पीछे है.

रिपोर्ट : विपिन कुमार

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Published Date

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