देश में समाप्त हो रही है खिला कर खाने की परंपरा : शंकराचार्य

Updated at : 23 Mar 2016 4:50 AM (IST)
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देश में समाप्त हो रही है खिला कर खाने की परंपरा : शंकराचार्य

मनोहरपुर/आनंदपुर : हमारे देश में खिलाकर खाने की परंपरा समाप्त हो रही है. इसका मूल कारण है कि बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा में धर्म को स्थान नहीं मिल पा रहा है. सरकारी स्कूलों में 200 हिंदू के बच्चे पढ़ते हैं. लेकिन मात्र तीन अन्य धर्म के बच्चे के कारण उन स्कूलों में धर्म […]

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मनोहरपुर/आनंदपुर : हमारे देश में खिलाकर खाने की परंपरा समाप्त हो रही है. इसका मूल कारण है कि बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा में धर्म को स्थान नहीं मिल पा रहा है. सरकारी स्कूलों में 200 हिंदू के बच्चे पढ़ते हैं. लेकिन मात्र तीन अन्य धर्म के बच्चे के कारण उन स्कूलों में धर्म का पाठ पढ़ाना वर्जित कर दिया गया है.यह कैसी व्यवस्था है.पूरे देश में हिंदुओं को धर्मांतरण कराया जा रहा है. भूलवश जो लोग अपने धर्म से अन्य धर्मों में चले गये हैं,

वे धीरे-धीरे लौट रहे हैं. उन्हें मार्ग दर्शन की आवश्यकता है. सभी वापस अपने घर लौट आयेंगे. शिक्षा में धर्म को भी स्थान मिले. उक्त बातें अनंत विभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर व द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरुपानंद सरस्वती जी महाराज ने सोमवार की संध्या में विश्व कल्याण आश्रम में अपने प्रवचन में कहा.

उन्होंने कहा कि भोक्ता के लिये भोग बना है,भोग के लिये भोक्ता नहीं. मनुष्य के लिये भोजन होता है, भोजन के लिये मनुष्य नहीं. राम से बड़ा राम का नाम है. कल्पित की अराधना करने के बजाये राम को जाने उसे माने. राम लला की पूजा होगी, साधु संत मिलकर बनायेंगे राम लला का मंदिर.

शंकराचार्य ने कहा कि मोह सारे दु:खों का कारक है. जिस प्रकार मकड़ी अपने शरीर के लार से अपना जाल बुन लेती है,उसी प्रकार मनुष्य इस संसार में अपना जाल खुद बुन लेता है.भगवान से प्रेम करें, वे स्वयं आपके दु:खों का निवारण करेंगे. आपके साथ आयेंगे.
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में विभिन्न जाति के लोग रहते हैं,और सभी भगवान की भक्ति के अधिकारी हैं. केवट व रविदास का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जिन्होंने सच्चे मन व आत्मा से भगवान का सुमिरन किया है,भगवान उन्हें साक्षात दर्शन देकर उनके दु:खों का निवारण करते हैं.
इस युग में सत्संग का आनंद अवश्य लें,चूंकि आत्मा में ही परमात्मा का वास होता है. जिस प्रकार कोयला अग्नि के संपर्क में आने से अपनी लालिमा प्राप्त करता है,उसी प्रकार मनुष्य आत्मा की शरण में आकर दु:खों का अंत कर सकता है.
जीवन रूपी सागर को पार करने के लिये सत्संग एकमात्र रास्ता है. शंकराचार्य ने कहा कि विश्व कल्याण आश्रम झारखंड राज्य का पवित्र तीर्थ स्थल है. यहां इस राज्य के अलावा पश्चिम बंगाल,ओड़िशा,छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश व बिहार समेत पूरे देश से लोग यहां सत्संग का लाभ लेने पहुंचते हैं.
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