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गूंजने लगता है आसमान नगाड़े-सा

Updated at : 03 Jun 2022 12:26 PM (IST)
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गूंजने लगता है आसमान नगाड़े-सा

वह संघर्ष प्रतिरोध में सौंदर्य देखती हैं, क्योंकि जनआंदोलन ही जंगल, पहाड़ों को बचाने के साथ उनकी स्वायत्तता की भी रक्षा कर सकते हैं. धरती, प्रकृति के साथ आदिवासी अस्तित्व पर मंडराते खतरे को आभिजात्य सौंदर्यबोध के आधार पर नहीं समझा जा सकता.

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डॉ सावित्री बड़ाईक

समकालीन हिंदी कविता की प्रमुख आदिवासी कवयित्री जसिंता केरकेट्टा का तीसरा काव्य संग्रह है – ईश्वर और बाजार. यह वाणी प्रकाशन से वर्ष 2022 में प्रकाशित हुआ है. इस संग्रह की अनेक कविताओं में देश के आदिवासी जीवन पर मंडराते खतरों, आदिवासियों पर हो रहे सांस्कृतिक हमलों, संसाधनों की लूट के लिए जिम्मेदार सत्ता संरचनाओं और जंगलों पहाड़ों की ओर अभिमान के साथ बढ़ते विकास की आक्रामक मुद्राओं पर चिंता व्यक्त की गयी है. इस संग्रह में एक सौ से अधिक कविताएं हैं. आदिवासी सहित सामान्य जनमानस में ईश्वर के डर को पहचानते हुए वे ईश्वर और बाजार को स्पष्ट करती हैं. वस्तुत: संगठित धर्म आदिवासियों को उनकी आस्था के केंद्रों– पेड़, पहाड़, जंगल, नदी से छिनगाकर उनमें ईश्वर की स्थापना करता रहा है. इस काव्य-संग्रह में स्त्री, धरती, इंसानियत, आदिवासियत केंद्रीय विषय है. इस संग्रह की राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना की कविताएं पिछले दोनों संग्रहों से अधिक सफल व चिंतनपरक कविताएं हैं.

कवयित्री देश में चल रहे विभिन्न आंदोलनों के साथ सत्ता और पूंजी का निर्मम चेहरा देखती हैं. इस संग्रह को जसिंता ने झारखंड के सारंडा, ओड़िशा के नियमगिरि और छत्तीसगढ़ के बैलाडीला पहाड़ के लोगों को समर्पित किया है, जो जंगल, पहाड़ों और नदियों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इस संग्रह में धर्म, पूंजी, बाजार की सत्ता, स्थापित चेतना और सत्ता संरचनाओं की शक्ति के विरुद्ध कविताएं हैं. ऐसे समय में जब चुप्पियां सारी जगहों पर बढ़ती जा रही हैं, जसिंता की कविताओं का मूल स्वभाव प्रश्नकर्ता का है – आदमी के लिये/ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता/बाजार से होकर क्यों जाता है? इन कविता शीर्षकों में भी कई प्रश्न हैं – इसका हिसाब कौन देगा साब?/सेना का रुख किधर है?/क्यों अंगूठा भर छोड़ दिया गया?/किसकी भाषा समझते हैं वे ? पेड़ों ने तुमसे क्या कहा?

जंगल, पहाड़ी जलधाराओं की सहयात्री जसिंता के इस संग्रह में पहाड़ शृंखला की कई कविताएं हैं, जो आदिवासी जीवन मूल्यों और सौंदर्यबोध को स्पष्ट करने वाली कविताएं हैं. पठार के पहाड़ बादलों को रोककर आदिवासियों की कृषि संस्कृति में सहायक हैं. अत: आदिवासी पहाड़ों के प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं. ‘पहाड़ और हथियार’, ‘पहाड़ और पैसा’, ‘पहाड़ और सरकार’, ‘पहाड़ और पहरेदार’, ‘पहाड़ और प्यार’, इन सभी कविताओं में आदिवासी दृष्टि से संघर्ष, प्रतिरोध, सौंदर्य स्पष्ट किया गया है. एक छोटी सी कविता है ‘पहाड़ों के लिए’. इसकी पंक्तियां हैं – थोड़े से पैसों के लिए/जो अपना ईमान बेचते हैं/वे क्या समझेंगे/पहाड़ों के लिए कुछ लोग/क्यों अपनी जान देते हैं. ‘पहाड़ पर हथियार ही स्त्रियों का शृंगार है’, बताते हुए वे आदिवासी सौंदर्यबोध को स्पष्ट करती हैं. पहाड़ और पहरेदार कविता पढ़ते हुए नियमगिरि के कोंध आदिवासियों की सहज स्मृति हो आती है, जिनका पहाड़ के बिना कोई अस्तित्व नहीं है.

‘इंतजार’ कविता की सिर्फ दो पंक्तियों में सभ्यता और इंसानियत को स्पष्ट किया गया है – वे हमारे सभ्य होने के इंतजार में हैं/और हम उनके मनुष्य होने के. जसिंता शब्दों को पत्थर–सा लपेट गुलेल की तरह उछालती हैं. ‘ईश्वर और बाजार’ की कई कविताएं चमत्कृत करती हैं. कविता संग्रह में रचनाकार की दृष्टि का भी विस्तार है जो वस्तुत: आदिवासी जीवन दृष्टि है जिसमें समानता, सहभागिता, सामुदायिकता, सहजीविता का जीवन मूल्य है. ‘हमारा हिसाब कौन देगा साब’ कविता भारत अमेजन और दुनिया भर के आदिवासी क्षेत्रें में स्थित जंगल को बचाने के लिए संघर्षरत आदिवासियों के संघर्ष और प्रतिरोध के प्रति पक्षधरता की कविता है – मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर टूटने पर/तुम्हारा दर्द कितना गहरा होता है/कि सदियों तक लेते रहते हो उसका हिसाब/पर जंगल जिनका पवित्र स्थल है/उसको उजाड़ने का हिसाब कौन देगा साब.

‘धमाकों के बीच चिड़िया’ कविता में आदिवासी क्षेत्रें में आदिवासियों के खून से धरती के लहूलुहान होने की व्यथा-कथा है. कविता चिड़ियां के स्थान पर आदिवासी को रखकर भी पढ़ी जा सकती है. कवयित्री ने मार्मिक पंक्तियां लिखीं हैं – धमाकों की एक तय रात में/क्या करती हैं चिड़ियां/क्या हर धमाके से डरकर नींद से जागती हैं/या अपने बच्चों को घोसले में छोड़ इधर-उधर सारी रात भागती हैं/या लौट-लौट कर अपने बच्चों के अधखुले पंख जले पंख गिनती हैं/या जल गये घोंसलों को/फिर से बनाने के लिए/सारी रात नई तिनके चुनती हैं. ये पंक्तियां बस्तर के मानव विरोधी काले इतिहास सलवा जुड़ुम की याद दिला देती है जिसमें हजारों लोगों को अपने घर से बेघर हो जाना पड़ा है.

‘क्यों मिटाए गए अखड़ा धुमकुड़िया?, कविता में कथित मुख्य धारा के प्रभाव से आदिवासियों के संवाद समानता और सामुदायिकता के स्थलों को मिटाये जाने के कारणों की पड़ताल की गयी है– वे चाहते हैं/आदमी पैदा होता रहे/कठोर निर्मम और बहरा/इसलिए एक दिन उन्होंने मिटा दिये/गांवों जंगलों से धुमकुड़िया/गिति: ओड़ा गोटुल और अखड़ा. ‘क्यों अंगूठा भर छोड़ दिया’ कविता में कवयित्री एकलव्य के अंगुठे छीने जाने को बराबरी का हक न देने से जोड़ती है और अब अंगूठा भर छोड़ दिया गया है क्योंकि जंगल का आदमी ठप्पा लगाकर गांव, जंगल, पहाड़ को सत्ता संरक्षित हृदयहीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर दें. .

आत्मरक्षा के नाम पर कविता छोटी एवं मार्मिक है. कविता की पंक्तियां अहिंसात्मक आंदोलन के लिए प्रेरित करती हैं – धरने पर बैठकर मैंने/महीनों उसका इंतजार किया/पर कोई जवाब न आया/थककर एक दिन मैंने/जैसे ही पत्थर उठाया/कोई बल अचानक बाहर आया/और आत्मरक्षा के नाम पर मुझे मार गिराया. ‘समय की सबसे सुंदर तस्वीर’ युवकों को शिक्षित, संगठित और संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती है. अभी कुछ दशकों से वंचित तबके और आदिवासी साक्षर होने लगे हैं. ऐसे समय में उन्हें कलम, कॉपी, किताब, की अधिक आवश्यकता है.

जसिंता के काव्य संग्रह का बहुत बड़ा भाग नारी अस्मिता के भाव चित्रों-बिंबों से सजा है. मां पर केंद्रित एक बहुत ही मार्मिक कविता है ‘तुम इस तरह आना’ जिनकी अंतिम पंक्तियां हैं – जब भी देखता हूं एक जोड़ा तितली/घुस आता है कमरे में साथ–साथ/मुझे लगता है/मां यहीं कहीं है आस-पास. इस संग्रह में ‘ईश्वर की परछाई‘ एक और महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें आदिवासी जीवन-दर्शन के अनुसार ईश्वर और मां को एक साथ लाने का प्रयास है.

इस संग्रह की कविताओं के द्वारा कवयित्री आदिवासी को अपना स्वमूल्यांकन करने, जागृत होने, संघर्ष जन-आंदोलन में शामिल होने के साथ, कथित मुख्यधारा को प्रकृति पर्यावरण के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों के समर्थन में खड़े होने, आदिवासियों की भाषा समझने, उनसे संवाद स्थापित करने के लिए आमंत्रित करती हैं. यथास्थिति की आलोचना, मार्मिकता, सहजता, विषयों की विविधता, जनपक्षधरता, क्रांतिधर्मिता, वैचारिक प्रतिबद्धता जसिंता की कविताओं की विशिष्टता है. वह संघर्ष प्रतिरोध में सौंदर्य देखती हैं, क्योंकि जन-आंदोलन ही जंगल, पहाड़ों को बचाने के साथ उनकी स्वायत्तता की भी रक्षा कर सकते हैं. धरती, प्रकृति के साथ आदिवासी अस्तित्व पर मंडराते खतरे को आभिजात्य सौंदर्यबोध के आधार पर नहीं समझा जा सकता. वस्तुत: आदिवासी सौंदर्यशास्त्र–सौंदर्यबोध की दृष्टि से भी यह काव्य संग्रह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें इंसानियत, आदिवासियत के साथ संपूर्ण समष्टि बचाने का संकल्प चित्रित हुआ है.

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