खरसावां : लोक पर्व मकर संक्रांति सोमवार को, लोहड़ी जलाने की है परंपरा

– तीलकुट व गुढ़ी पीठा खाकर करेंगे दिन की शुरुआत – असुरी विचार को छोड़, दैवी विचार को अपनाने का संदेश देती है मकर संक्रांति शचिंद्र कुमार दाश, खरसावां साल का पहला व क्षेत्र का सबसे बड़ा त्योहार मकर संक्रांति पर सोमवार को अहले सुबह हजारों लोग विभिन्न जलाशयों पर आस्था की डुबकी लगायेंगे. मकर […]
– तीलकुट व गुढ़ी पीठा खाकर करेंगे दिन की शुरुआत
– असुरी विचार को छोड़, दैवी विचार को अपनाने का संदेश देती है मकर संक्रांति
शचिंद्र कुमार दाश, खरसावां
साल का पहला व क्षेत्र का सबसे बड़ा त्योहार मकर संक्रांति पर सोमवार को अहले सुबह हजारों लोग विभिन्न जलाशयों पर आस्था की डुबकी लगायेंगे. मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व रविवार को बाउंडी का आयोजन किया गया. बाउंडी के मौके पर कई जगहों पर मेला भी लगाया गया. सोमवार की सुबह मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जायेगा. स्नान के पश्चात लोहड़ी (स्थानीय भाषा में अघीरा) जलाया जायेगा. लोहड़ी जलाने के पश्चात तीलकुट व गुड़ पीठा खाकर बड़ों से आशीर्वाद लेने की परंपरा है.
इसके पश्चात दान पुण्य कर मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की जायेगी. मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा खाने की भी परंपरा है. मकर संक्रांति पर दान-पुण्य करने की भी परंपरा है.
मकर संक्रांति पर होंगे कई कार्यक्रम
दान पुण्य के बाद दिन भर मौज मस्ती से दिन गुजरेगी. संक्रांति को लेकर घरों के सामने भी कई तरह के आकर्षक रंगोली बनाये गये हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में जनजातीय बहुल गांवों में मागे नृत्य का आयोजन किया जायेगा. महिला व पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मांदर के थाप पर पूरे लय के साथ मागे नृत्य करेंगे. संक्रांति के मौके पर खरसावां के गोंदपुर व सरायकेला के साहेबगंज में भी मेला का आयोजन किया जायेगा.
नकारात्मक विचार को त्याग करने का संदेश देती है मकर संक्रांति
मकर संक्रांति को देवताओं का सूर्योदय माना जाता है. यह पर्व असुरी (नाकारात्मक) विचार को छोड़कर दैवी (सकारात्मक) विचार को अपनाने का संदेश देती है. सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है. संक्रांति के लगते ही सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं. सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही दिन बड़े और रात छोटे होते जाते हैं.
मकर संक्रांति सूर्योपासना का ऐसा ऋतु पर्व है, जो हमारे लौकिक जीवन को देव जीवन की ओर मोड़ता है. यह पर्व हमारे भीतर शुभत्व व नवजीवन का बोध भरकर हमें चैतन्य, जाग्रत, जीवंत व सक्रिय बनाता है. गौरतलब है कि एकमात्र सूर्य ही ऐसे प्रत्यक्ष देवता हैं, जो सतत क्रियाशील रहकर हम धरतीवासियों का भरण-पोषण करते हैं.
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