लंबे संघर्ष के बाद तीरंदाज मंजुदा को मिला मुकाम

खरसावां : तीरंदाज मंगल सोय को लंबे संघर्ष के बाद ही अपना मुकाम हासिल हुआ है. मंजुदा फिलहाल रेलवे में नौकरी कर रही है. मंजुदा को खेल कोटा से ही रेलवे में नौकरी मिली है. कुचाई के पिछड़े जोबाजंजीर गांव की रहने वाली मंजुदा शुरू से ही तीरंदाजी की शौकीन रही है. वर्ष 2003 में […]
खरसावां : तीरंदाज मंगल सोय को लंबे संघर्ष के बाद ही अपना मुकाम हासिल हुआ है. मंजुदा फिलहाल रेलवे में नौकरी कर रही है. मंजुदा को खेल कोटा से ही रेलवे में नौकरी मिली है. कुचाई के पिछड़े जोबाजंजीर गांव की रहने वाली मंजुदा शुरू से ही तीरंदाजी की शौकीन रही है. वर्ष 2003 में मंजुदा को टैलेंट हंट प्रोग्राम के तहत टाटा आर्चरी अकादमी में प्रवेश मिला. टाटा आर्चरी अकादमी में रहते हुए मंजुदा को कई बार इंटर स्टेट चैंपियनशिप में भाग लेने का मौका मिला, परंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई मेडल नहीं जीत सकी.
टाटा आर्चरी अकादमी से पास आउट होने के बाद मंजुदा सरायकेला-खरसावां तीरंदाजी संघ से जुड़ी. यहां से खेलते हुए मंजुदा सफलता की कई सीढ़ियां चढ़ती गयी. परिवार के आर्थिक पिछड़ेपन के बावजूद मंजूदा ने तीरंदाजी नहीं छोड़ी और अपनी मंजिल पर चलती रही. इस दौरान मंजुदा सोय का कई बार भारतीय तीरंदाजी टीम में चयन हुआ, जिस दौरान वह मेडल जीतने में सफल रही. 33 वें राष्ट्रीय खेल में स्वर्ण पदक जीत कर मंजुदा ने स्वयं को देश के सफल तीरंदाजों में शामिल कर लिया. 23 अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में भाग ले चुकी मंजुदा सोय फिलहाल रेलवे में कार्यरत है. मंजुदा सोय की गिनती आज सिर्फ देश के सफलतम तीरंदाजों में होती है, बल्कि मंजुदा ने अपने गांव व देश का नाम भी रौशन किया है. मंजुदा के मां व पिता को अपनी बेटी की सफलता पर नाज है.
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