गणतंत्र दिवस 2020 : इनसे है संविधान, संविधान की हिफाजत इनकी जिंदगी का लक्ष्य

Updated at : 26 Jan 2020 2:51 AM (IST)
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गणतंत्र दिवस 2020 : इनसे है संविधान, संविधान की हिफाजत इनकी जिंदगी का लक्ष्य

आज गणतंत्र दिवस है. संविधान की स्थापना का पवित्र दिन. देश की आजादी के साथ आम अवाम को मिले संवैधानिक अधिकारों के लिए उत्सव का दिन. यह हजारों स्वतंत्रता सेनानियों की तप-तपस्या और बलिदान का प्रतिफल है. इसे बरकरार रखने का संघर्ष भी अनवरत है. पिछले 70 वर्षों से ऐसे नायक देश-समाज में हैं, जो […]

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आज गणतंत्र दिवस है. संविधान की स्थापना का पवित्र दिन. देश की आजादी के साथ आम अवाम को मिले संवैधानिक अधिकारों के लिए उत्सव का दिन. यह हजारों स्वतंत्रता सेनानियों की तप-तपस्या और बलिदान का प्रतिफल है. इसे बरकरार रखने का संघर्ष भी अनवरत है. पिछले 70 वर्षों से ऐसे नायक देश-समाज में हैं, जो इसे अक्षुण्ण बनाये हुए हैं. हम संविधान के लिए संघर्ष करनेवाले ऐसे ही नायकों को आपके सामने ला रहे हैं.

एके रशीदी संविधान की हिफाजत नकी जिंदगी का लक्ष्य
झा रखंड स्टेट बार काउंसिल के सदस्य व वरीय अधिवक्ता एके रशीदी का हमेशा सामाजिक सरोकार से लगाव रहा है. वर्ष 1990 में वकालत के पेशे में आने के बाद अपने जिंदगी में भारतीय संविधान को उन्होंने आत्मसात किया. श्री रशीदी संविधान की रक्षा में लगे रहते हैं. जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर द्वारा स्थापित इंडियन एसोसिएशन अॉफ लॉयर्स की झारखंड इकाई में महासचिव पद का दायित्व निभा रहे हैं. 10 वर्षों से गणतंत्र दिवस पर संविधान बचाअो रैली का आयोजन कर लोगों को जागरूक कर रहे हैं. डोरंडा के अंबेडकर चाैक पर हर वर्ष संविधान की प्रस्तावना का पाठ होता है.

इतना ही नहीं, एसोसिएशन के कार्यक्रमों की शुरुआत संविधान की प्रस्तावना के पाठ से की जाती है. श्री रशीदी कहते हैं कि भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है. जनता ने संविधान के माध्यम से अपने नागरिक अधिकाराें को अपने द्वारा अपने ऊपर लागू किया है. यह सिर्फ संविधान नहीं है, बल्कि यह एक नागरिक संहिता है. यह आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक न्याय, समानता, सदभावना, भाईचारा, गाैरवमयी व बहुरंगी संस्कृति की गारंटी और समाज के सभी वर्गों को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार देता है.

संविधान द्वारा न सिर्फ अधिकार प्राप्त किये गये हैं, बल्कि हम अपने माैलिक कर्तव्य भी तय किये गये हैं. श्री रशीदी ने कहा कि हम अपने जीवन में भारतीय संविधान को मानदंड के रूप में मानते हैं. संविधान हमारी पहचान है. इसकी हिफाजत मेरी जिंदगी का लक्ष्य है.

ज्यांद्रेज : भारतीयों के अधिकारके लिए संघर्ष कर रहे
मू ल रूप से बेल्जियम के रहनेवाले ज्यां द्रेज भारतीयों को संविधान के तहत मिले अधिकारों को दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. भारत में रहनेवाले लोगों को भारत की संविधान के तहत मिले अधिकारों को लेकर जागरूक कर रहे हैं. ज्यांद्रेज अब भारतीय हो गये हैं. भारत सरकार की नागरिकता ले ली है. फिलहाल झारखंड में सक्रिय है. वर्ष 1993 से 2002 तक दिल्ली में सक्रिय रहे. 2002 से 2004 तक इलाहाबाद में सक्रिय रहे. वर्तमान में रांची में रहकर लोगों के भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार समेत अन्य मुद्दों को लेकर सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं.

भारत सरकार ने उनको कई राष्ट्रीय स्तर की कमेटियों में रखा है. संघर्ष करना ज्यांद्रेज की फितरत में है. 1959 में इनका जन्म बेल्जियम में हुआ. नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के साथ मिलकर अर्थव्यवस्था पर पुस्तक लिखी. पिता जैक्सद्रेंज विश्व के जाने-माने अर्थशास्त्री थे. वर्तमान में वह दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स व रांची विवि में अर्थशास्त्र के विजिटिंग प्रोफेसर हैं. 1980 में उन्होंंने यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स से मैथमेटिक्स इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की.

इंडियन स्टैटिकल इंस्टीट्यूट से पीएचडी की. वह वर्ष 1979 से भारत में रह रहे हैं. वर्ष 2002 में भारत सरकार ने यहां की नागरिकता दी है. 1980 में उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई भी थी. वह अपनी सहजता के कारण जाने जाते हैं.

भारत में वह कई बार बेघरों के साथ रात बिताने चले जाते थे. दिल्ली में रहने के दौरान झुग्गी के लोगों का जीवन समझने के लिए पत्नी बेला भाटिया के साथ एक कमरे के घर में रहते थे. वर्ष 1990-91 में इराक युद्ध के दौरान वह शांति दूत बनकर इराक-कुवैत बाॅर्डर में रहने चले गये थे. 1992 में उन्होंने इराक में गरीबी और भुखमरी पर लेख भी लिखा था.
सरयू राय : संविधान और कानून काे स्थापित करने में जुटे हैं
अमूमन एक राजनीतिक व्यक्तित्व अपने जनाधार, सत्ता के शीर्ष तक पहुंच, राजनीतिक पद-प्रतिष्ठा और सियासी रुतबे के कारण जाना जाता है़ लेकिन सरयू राय एक ऐसे राजनीतिक शख्सियत हैं, जिनकी पहचान शायद इस दायरे से कहीं ज्यादा संविधान व कानून काे स्थापित करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है़
वर्ष 1974 में जेपी आंदोलन से सरयू राय ने सक्रिय राजनीति की शुरुआत की़ एकीकृत बिहार में एमएलसी बने, फिर झारखंड में 2005 में विधायक बने़ 2019 के चुनाव में जमशेदपुर पूर्वी से मुख्यमंत्री रघुवर दास को हरा कर राजनीतिक सूरमा बने़
सरयू राय ने अपने पूरे करियर में राजनीति के साथ चलनेवाली समांतर लकीरें खींची है़ं इसमें घपले-घोटाले को उजागर करना, असंवैधानिक कार्यों को न्यायालय की चौखट तक ले जाना और सिस्टम के साथ खिलवाड़ करनेवालों को सजा दिलाने का संघर्ष शामिल है़ 1994 में पहली बार चारा घोटाले को उजागर किया़ तथ्यों और प्रमाण की बदौलत सीबीआइ जांच से लेकर विभिन्न न्यायालयों में लंबी लड़ाई लड़ी़
अलकतरा घोटाला, मधु कोड़ा के मुख्यमंत्री काल में हुए घोटाले सहित समय-समय पर वित्तीय अनियमितता को लेकर मुखर रहे़ सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों का बिना चेहरा, राजनीतिक संबंध देखे मुद्दा उठाया और पावर ब्राेकर के साथ सांठ-गांठ को बेपर्द किया़
इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए सरयू राय ने अभूतपूर्व काम किया़ इसे भी संविधान-कानून के दायरे में कसने का काम किया़ 1982 में सोन नदी को लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच हुए एकरारनामा पर सवाल उठाये़
तत्कालीन बिहार की इस बड़ी समस्या को लेकर अलग-अलग फोरम पर आवाज उठायी़ आंदोलन को गति देने के लिए बिहार खेतिहर मंच बनाया़ नदियों को प्रदूषण मुक्त करने का अभियान चलाते रहे . झारखंड में सक्रिय राजनीति करते हुए, इन्होंने ऐसे संवेदनशील मामलों को लेकर बड़े समूह को गोलबंद किया़ इसे समाज की चिंता का स्वरूप दिया़
स्वच्छ व प्रदूषण मुक्त वातावरण के अधिकार को अपनी लड़ाई का हिस्सा बनाया़ दामोदर बचाओ आंदोलन, स्वर्णरेखा प्रदूषण मुक्त अभियान, जल जागरूकता अभियान और सारंडा बचाओ अभियान इनके सामाजिक चिंता का हिस्सा था़ नदियों के किनारे स्थापित सरकारी-गैर सरकारी कल-कारखाना के प्रदूषण के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी़
बलराम : खाद्य सुरक्षा और भूमि आंदोलन में मुखर रहे हैं
सामाजिक कार्यकर्ता बलराम देश भर में खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर सुप्रीम कोेर्ट द्वारा गठित कमेटी के सलाहकार हैं. खाद्य सुरक्षा कानून व भोजन का अधिकार अभियान जैसे मुद्दे पर वह मुखर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट की यह कमेटी वर्ष 2001 में बनी.
इससे पूर्व संविधान द्वारा प्रदत्त सामाजिक व व्यक्तिगत अधिकारों के लिए हुए आंदोलनों में शरीक रहे हैं. उन्होंने बोधगया में हुए भूमि आंदोलन में हिस्सा लिया था . यह आंदोलन मजदूरों व वंचितों को जमींदारों की जमीन पर शांतिपूर्ण दखल दिलाने के लिए हुअा था. तब पहली बार जमीन का पट्टा महिलाअों के नाम पर करने की बात चली थी.
बकौल बलराम इस आंदोलन में करीब दो हजार एकड़ जमीन गरीबों को मिली थी. इधर चांडिल डैम के निर्माण के दौरान विस्थापित हुए लोगों को भी उनका हक दिलाने के लिए वह संघर्षरत रहे. वर्ष 1990 में सांप्रदायिक सौहार्द कायम रखने की कोशिश, वर्ष 1991 में संपूर्ण साक्षरता अभियान तथा वर्ष 2000 में स्वास्थ्य सबके लिए अभियान में भी बलराम शामिल रहे थे. इससे पहले 1995-96 में पलामू का सूखा देश भर में चर्चित हुआ था.
तब नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे. सूखे से निबटने तथा इसके दीर्घकालीन समाधान के लिए जल संरक्षण के कार्य, गांव में ही विकास योजनाएं बनाने संबंधी विचार व कुछ अन्य पहल में बलराम अपनी साझेदारी भी मानते हैं. वर्तमान में खाद्य सुरक्षा सहित अन्य सामाजिक अधिकारों के लिए हो रहे आंदोलनों में उनका दृष्टिकोण कांस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क का रहता है.
यानी अांदोलनरत संबंधित ग्रुप या लोगों के समूह को यह सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी सलाह देना कि उनकी मांग संविधान के किस प्रावधान के तहत आती है. बलराम मानते हैं कि संवैधानिक दायरे में रह कर कुछ मांगना हर भारतीय का अधिकार है तथा इस तरीके से उठनेवाली मांग पूरा होने तथा इसके लिए न्यायिक हस्तक्षेप होने की संभावना भी बढ़ जाती है.
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