रांची : यूटीआइ निवेश मामले में कार्रवाई का आदेश

Updated at : 11 Sep 2019 8:54 AM (IST)
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रांची : यूटीआइ निवेश मामले में कार्रवाई का आदेश

मनोज सिंह रांची : रांची-खूंटी सेंट्रल सहकारी को-आॅपरेटिव बैंक में यूटीआइ इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश का मामला फिर जिंदा हो गया है. बैंक को घाटा दिलाने के आरोप में तीन अधिकारियों पर कार्रवाई की अनुशंसा की गयी है. सहकारिता विभाग के मंत्री ने इसे मामले में दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की अनुशंसा (प्रपत्र-क गठित) कर दी […]

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मनोज सिंह
रांची : रांची-खूंटी सेंट्रल सहकारी को-आॅपरेटिव बैंक में यूटीआइ इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश का मामला फिर जिंदा हो गया है. बैंक को घाटा दिलाने के आरोप में तीन अधिकारियों पर कार्रवाई की अनुशंसा की गयी है.
सहकारिता विभाग के मंत्री ने इसे मामले में दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की अनुशंसा (प्रपत्र-क गठित) कर दी है. करीब 10 साल पहले इस बैंक में तीन करोड़ रुपये यूटीआइ इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश हुए थे. इसको निकालने के समय बैंक को नुकसान हो गया था. इस मामले की जांच 2014 में तत्कालीन पथ निर्माण सचिव राजबाला वर्मा से करायी गयी थी. उन्होंने जांच रिपोर्ट में लिखा था कि प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी थी कि निवेश की गयी राशि उस वक्त निकाल लेते जब उसका मार्केट वैल्यू अधिक हो गया था.
ऐसा नहीं करने के कारण बैंक को नुकसान हुआ. उन्होंने ऐसे अधिकारियों को चिह्नित कर कार्रवाई की अनुशंसा कर की थी. बाद में कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग के सचिव डॉ नितिन मदन कुलकर्णी ने इन अधिकारियों पर कार्रवाई का निर्देश दिया था. लेकिन निबंधक के यहां से यह संचिका मंत्री के पास नहीं भेजी गयी थी. इस कारण इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हो पायी थी.
फायदे में नहीं निकाली गयी थी राशि : 2008 में यूटीआइ इंफ्रास्ट्रक्चर में तीन करोड़ रुपये निवेश किये गये थे. निवेश के छह माह बाद राशि निकाली जा सकती थी.
लेकिन ऐसा नहीं किया गया. जबकि निवेश किये गये रुपये का वैल्यू करीब 11 बार ज्यादा भी हुआ था. हालांकि, शेयर बाजार गिरने के कारण निवेश की गयी राशि कम भी हुई थी. इस बीच 2010 के बाद निबंधक सहयोग समितियां ने कई बार बैंक से निवेश किये गये रुपये की जानकारी ली. साथ ही घाटे से उबरने के लिए सुझाव भी मांगा. इसी बीच बैंक ने निवेश करानेवाले एजेंट को भी हटा दिया. जबकि एजेंट बीच-बीच में कई बार राशि निकालने की सलाह दे चुके थे.
एक बार तत्कालीन प्रबंध निदेशक ने भी राशि निकालने की कोशिश की, लेकिन तकनीकी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण राशि नहीं निकाल सके. इस दौरान निवेश की समयावधि पूरी हो गयी. नतीजतन, तीन करोड़ की जगह करीब 2.65 करोड़ रुपये ही बैंक को मिले.
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