रांची: तीन साल में छह आदिवासी बाहुल्य जिलों में खर्च किये जायेंगे 150-150 करोड़ रुपये : रघुवर दास
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 Jun 2019 9:32 AM (IST)
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नयी दिल्ली में हुई नीति आयोग की बैठक, मुख्यमंत्री ने कहा रांची/नयी दिल्ली : मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए देश के 115 अति पिछड़े जिलों को आकांक्षी जिले के रूप में परिभाषित किया गया है. झारखंड में 24 में से 19 जिले आकांक्षी के रूप में चिह्नित […]
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नयी दिल्ली में हुई नीति आयोग की बैठक, मुख्यमंत्री ने कहा
रांची/नयी दिल्ली : मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए देश के 115 अति पिछड़े जिलों को आकांक्षी जिले के रूप में परिभाषित किया गया है. झारखंड में 24 में से 19 जिले आकांक्षी के रूप में चिह्नित किये गये हैं. इनमें 16 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित हैं. इन जिलों में शत प्रतिशत पेयजल व शौचालय की सुविधा प्रदान की गयी है.
सभी विद्यालयों में विद्युतीकरण की व्यवस्था सुनिश्चित करायी गयी है. छह आदिवासी बाहुल्य जिले खूंटी, सिमडेगा, गुमला, साहेबगंज, पश्चिमी सिंहभूम व पाकुड़ में आकांक्षी जिला योजना का कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इसके तहत प्रत्येक जिले को वर्ष 2018-19 से 2020-21 तक यानी तीन वर्षों में कुल 150-150 करोड़ की राशि दी जा रही है,ताकि इन जिलों के लोगों के जीवन स्तर को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया जा सके.
श्री दास शनिवार को नयी दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में आयोजित नीति आयोग की बैठक को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि चालू वर्ष आकांक्षी जिलों में ली गयी योजनाओं को पूर्ण कराने का लक्ष्य रखा गया है. इन जिलों के प्रत्येक परिवार को पेयजल, बिजली, शौचालय, उन्नत शिक्षा आदि मूलभूत सुविधाओं से शत प्रतिशत आच्छादित करना चुनौती है.
आपदा राहत कोष की शर्तों को बनाया जाये लचीला : मुख्यमंत्री ने कहा कि जल संकट सबसे बड़ी चुनौती है. झारखंड में औसतन 1400-1500 मिलीमीटर वर्षा होती है. पिछले कुछ वर्षों से राज्य में सुखाड़ की स्थिति उत्पन्न होती रही है.
पिछले वर्ष 18 जिलों के 129 प्रखंड सूखा से प्रभावित हो गये थे. इस वर्ष भी अब तक सामान्य से 50 प्रतिशत कम प्री मॉनसून वर्षा हुई है. सरकार की ओर से इसको लेकर कई कदम उठाये गये हैं. उन्होंने कहा कि आपदा राहत कोष को लेकर कई शर्तें लगायी गयी हैं. जिसकी वजह से तकनीकी दृष्टिकोण से सुखाड़ घोषित करने की स्थिति नहीं बन पाती है. इसमें आपदा राहत कोष का उपयोग वर्जित है. इस कोष से पुरानी जलापूर्ति योजनाओं की मरम्मति एवं पुनरुद्धार की स्वीकृति ही मान्य है.
परंतु छोटी-छोटी नयी योजनाओं का निर्माण इस कोष से वर्जित है. इस निधि से सहायता की राशि पर शर्तें लगायी गयी हैं. खराब हो गये सिंचाई योजनाओं की मरम्मति के लिए मात्र 1.50 लाख की अधिसीमा निर्धारित है. जबकि इसका निर्धारण वास्तविक जमीनी आकलन के आधार पर होना तार्किक होगा. ऐसे में राज्य सरकारों को आपदा राहत कोष के उपयोग में विशेषकर पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए शर्तों को लचीलापन बनाया जाना चाहिए.
निजी बाजारों की स्थापना की प्रक्रिया को सरल बनाना होगा : श्री दास ने कहा कि आर्थिक विकास में कृषि उत्पादों का महत्वपूर्ण योगदान है.
इसके लिए सिंचाई के साथ-साथ उन्नत बीज एवं आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की जरूरत है. इस क्षेत्र में निजी बाजारों की स्थापना की प्रक्रिया को सरल बनाने की जरूरत है. साथ ही निजी बाजारों के लाइसेंसीकरण के प्रावधानों में व्यापक सुधार की जरूरत है, क्योंकि स्टेट मार्केटिंग बोर्ड की स्थिति ऐसी नहीं रह गयी है कि वो ई-नाम योजना के तहत होनेवाले खर्चों का वहन कर सके.
एपीएमसी एक्ट और व्यापक कवरेज प्रदान करने की जरूरत है, ताकि कृषि विपणन बोर्ड अधिक सक्षम हो सके. उन्होंने कहा कि आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों में राज्य सरकारों ने आवश्यक वस्तु अधिनियम का उपयोग सिर्फ दालों की कीमतों को नियंत्रित करने में किया है. अत्यधिक उत्पादन होने की वजह से चावल व गेहूं के लिए यह अधिनियम अब सार्थक नहीं रह गया है.
इस बदली परिस्थियों में आर्थिक उदारीकरण के सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए आवश्यक वास्तु अधिनियम की आवश्यकता पर विचार करने की जरूरत है. इसके लिए नीति आयोग द्वारा एक सब ग्रुप का गठन करने पर विचार किया जा सकता है. दालों के वितरण को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों के तहत लाने पर भी विचार किया जाना उचित होगा.
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