सोशल मीडिया भी ज्ञान का जरिया है, बशर्ते इसे युवा समझें

Updated at : 03 Jun 2019 8:13 AM (IST)
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सोशल मीडिया भी ज्ञान का जरिया है, बशर्ते इसे युवा समझें

रांची : उनकी हास्य-व्यंग्य कविताओं को सुनकर जहां हंसी रोके नहीं रुकती, वहीं उनकी कई रचनाएं समाज के ज्वलंत मुद्दों के प्रति सहसा झकझोरती हुई बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर भी करती हैं. इसके इतर वे जब संवेदना को छूने वाली गंभीर कविताएं लेकर उपस्थित होते हैं, तो आंखें स्वतः नम हो जाती हैं. […]

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रांची : उनकी हास्य-व्यंग्य कविताओं को सुनकर जहां हंसी रोके नहीं रुकती, वहीं उनकी कई रचनाएं समाज के ज्वलंत मुद्दों के प्रति सहसा झकझोरती हुई बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर भी करती हैं. इसके इतर वे जब संवेदना को छूने वाली गंभीर कविताएं लेकर उपस्थित होते हैं, तो आंखें स्वतः नम हो जाती हैं.
विभिन्न विधाओं में वह सौ से भी ज्यादा पुस्तकें लिख चुके हैं. गीत-गजल, भजन, मंच संयोजक, लेखक, गीतकार और एक्टर के अलावा राज्यस्तरीय अकादमियों व राजनीति में कई उच्च पदों पर कार्य कर चुके इस कवि के लिए कोई विद्या अछूती नहीं है. कई फिल्मों के लिए टाइटल गीत लिखकर अपनी लेखन क्षमता को प्रकट किया तो वहीं बॉलीवुड में एक्टिंग कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि मेहनत के कैनवास पर उनका हर रंग जमता है. शायद यही वजह है कि देश का चौथा सबसे बड़ा भारतीय नागरिक पुरस्कार पद्मश्री अवॉर्ड डॉ. सुनील जोगी की उम्दा लेखनी व व्यक्तित्व के लिए प्रदान किया गया. एक कार्यक्रम में शामिल होने वह झारखंड पधारे हैं, उनसे बातचीत की प्रभात खबर संवाददाता बिपिन सिंह ने.
आपको हास्य-व्यंग्य के तौर पर जाना गया. समय के साथ आपकी पहचान एक लेखक, एक्टर, सामाजिक व राजनीतिक व्यक्ति के ताैर पर सामने आयी, खुद को आप किस तरह का व्यक्ति मानते हैं.
मैं खुद को महज एक साधारण व्यक्ति मानता हूं, जो अच्छी और प्रेरक कविताओं के साथ समाज में स्वस्थ विचारों को फैलाने के लिए वचनबद्ध है. मैं हंसना और हंसाना चाहता हूं. लोगों का प्यार है, जिसने इतने कम समय में मुझे वह सबकुछ दिया, जिसकी तमन्ना हर मेहनतकश व्यक्ति को रहती है. मुझे हास्य-व्यंग्य की विधा का कवि कहलाना अच्छा लगता है, पर मंजिलें अभी दूर हैं.
युवा साहित्य, पढ़ने-लिखने से दूर होने लगे हैं, उनके पास वक्त नहीं है.
युवा आज सोशल मीडिया की शरण में चले गए हैं, पर यह कहना कि वक्त नहीं है, सरासर गलत है, बहानेबाजी है. वह अपने दायित्वों से बच नहीं सकते, यह देश उनका है और इसे चलायेंगे भी वे ही. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को मैं बतौर कवि अच्छा मानता हूं, पर तब जब इसका इस्तेमाल कुछ बढ़िया करने के लिए हो. फालतू की चर्चाओं में अपना वक्त बर्बाद नहीं करें, जिन्हें जो काम करना है, वह करने दें. फेसबुक, ट्वीटर और इंटरनेट का साधन भी ज्ञान का जरिया हो सकते हैं, पर इसे समझना होगा.
आपकी कविताओं की धमक कवि सम्मेलनों के साथ ही 70 एमएम के पर्दे पर भी बढ़ रही है, यह कैसे संभव हुआ.
मेरे लिए फिल्मों के लिए गाने लिखना कोई नई बात नहीं है. इस योग्य हूं तो कोई परेशानी नहीं. पिछले दिनों रिलीज फिल्म मुक्काबाज में लोगों को लगा कि मैं फिल्मी गीत भी लिखने लगा हूं, लेकिन हकीकत है कि बॉलीवुड एक बड़ा कैनवास है, इससे कम वक्त में करोड़ों लोगों तक जुड़ा जा सकता है. अपने विचारों को वहां पहुंचाया जा सकता है.
पहले कवि, फिर गीतकार, एक्टर यह गंभीर बदलाव कैसे संभव हुआ.
बस यूं ही मुंबई से ऑफर आया, तो मैंने भी नई विधा में हाथ आजमाने के इरादे से इसे स्वीकार कर लिया और इसी के साथ एक्टिंग से भी नाता जुड़ गया. मेरे नाम से मेरे कर्मों का हिसाब न हो. जब हस्ताक्षर ऑटोग्राफ बन जाए , तब वह व्यक्ति सफल कहलाने लगता है. कुछ ऐसा करना है कि समाज में महज सांसें गिनना मेरा जीवन न रह जाए
भारत किस ओर जा रहा है, आपकी सोच क्या कहती है.
भारत युवाओं का देश है, इसके पास कुछ अलग होना चाहिए, इसकी सोच, इसके संस्कार अलग होने चाहिए. यह क्रांतिकारियों का देश है. भारत की राजनीति मजबूत रास्ते पर है, ऐसा जनादेश से भी स्पष्ट है. मैं दुनिया घूमा हूं, पर इनमें भारत कुछ अलग है. भारत संस्कारों, प्राचीन सभ्यताओं, आस्था और मूल्यों, विभिन्नता और एकता, गंगा और गायत्री का देश है, इसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता.
इतने थोड़े से वक्त में अपनी उपलब्धियों को आप किस तरह से देखते हैं
सचिन को इतने कम समय में ही भारत रत्न मिल गया. लोग मेहनत को अपनी दृष्टि से नहीं देख पाते, उस कैनवास को नहीं देख पाते. जो कोई भी सफल होता है तो उसके पीछे अनंत घंटों का निवेश होता है. अपने संघर्ष को कभी पीछे मुड़कर देखता हूं तो खुशी भी मिलती है और दुख भी.
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