हादसे ने व्यवस्था पर सवाल उठाया

Published at :24 Jul 2014 5:47 AM (IST)
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हादसे ने व्यवस्था पर सवाल उठाया

ढिबरा के अवैध खनन के दौरान चाल धंसने से युवक की मौत कोडरमा : ढिबरा के अवैध खनन के दौरान हुए हादसे में एक युवक ने अपनी जान गंवा दी. ढिबरा चुनने के दौरान सरमटांड़ निवासी 32 वर्षीय मो सरफराज उर्फ चरका (पिता मो रज्जाक) की मौत हो गयी. उसकी मौत से फिर वही सवाल […]

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ढिबरा के अवैध खनन के दौरान चाल धंसने से युवक की मौत

कोडरमा : ढिबरा के अवैध खनन के दौरान हुए हादसे में एक युवक ने अपनी जान गंवा दी. ढिबरा चुनने के दौरान सरमटांड़ निवासी 32 वर्षीय मो सरफराज उर्फ चरका (पिता मो रज्जाक) की मौत हो गयी.

उसकी मौत से फिर वही सवाल उठ रहा है, जो हर बार इस तरह के हादसे के बाद उठता है. पर ये सवाल क्या कभी हल होंगे. बात जो भी हो पर जिस तरह माइका का अवैध धंधा जिले में चल रहा है उससे पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा हो रहा है. आखिर यह किसके संरक्षण में या इशारे पर हो रहा है.

जंगल में जिंदगियां मिट्टी में दफन हो रही है और अवैध ढिबरा के कारोबार में लगे माफिया मालामाल हो रहे हैं. प्रभात खबर की टीम अवैध खनन के दौरान लोगों के मिट्टी में दबे होने की सूचना पर जब घटनास्थल के लिए चली, तो जगह का पता नहीं था.

लेकिन स्थानीय लोगों की मदद से प्रतिनिधि ने वहां जो कुछ देखा वह चौंकाने वाला था. कोडरमा के बागीटांड़ से लोकाई तक जानेवाले नयी बाइपास रोड के आगे से एक रास्ता जंगल की ओर जाता है.

यहां से थोड़ी दूर पर दाहिने घने जंगल में बाइक भी नहीं जा सकती. टीम वहां पैदल पहुंची, तो देखा कुछ लोग मिट्टी निकाल कर बाहर फेंक रहे हैं. लोगों ने बताया कि यहां एक युवक दबा है. घटनास्थल पर न तो प्रशासनिक अधिकारी पहुंचे थे. न ही खनन विभाग व पुलिस के कोई पदाधिकारी.

रोजाना 150 से 200 रुपये की आमदनी : घटनास्थल पर मृतक के साथी विजय दास ने बताया कि दिन में 1:30 बजे हादसा हुआ. उसने कहा कि हम ढिबरा नहीं चुन रहे थे. बल्कि चरका खाना खाने के लिए बैठा था. इसी दौरान मिट्टी धंस गयी. घटनास्थल पर ही मृतक का मोबाइल, खाने के लिए लाया गया चावल व सत्तू पड़ा था.

विजय ने बताया कि वे लोग करीब 30-35 की संख्या में रोजाना जंगलों में आते हैं. मोतिया माइंस वर्षो पहले खनन विभाग की ओर से बंद करार दिया गया है. बावजूद यहां ढिबरा चुनाई का काम होता है. विजय की मानें तो इससे रोजाना 150-200 रुपये की आमदनी होती है.

जब उससे पूछा गया कि इतना जान जोखिम में डाल कर काम क्यों, तो बोला क्या करें पेट भरने के लिए करना पड़ता है. मनरेगा के तहत काम करने की बात कही, तो जवाब मिला इसकी जानकारी नहीं है.

पूरा माफिया गिरोह करता है काम

मो सरफराज की मौत के बाद उसके गांव के कई लोग पैदल वहां पहुंचे थे. उन्होंने बताया कि ये यहां से ढिबरा चुनने के बाद गांव में ही महेंद्र साव व गोपाल माहुरी को देते हैं. ये लोग आगे के व्यापारी को ढिबरा देते हैं. प्रति किलो उन्हें 10 से 12 रुपये मिलता है.

वहीं पत्थलहिया, मोतिया माइंस से रास्ते में ढिबरा साइकिल पर लाद कर ला रहे लोगों ने बताया कि वे लोग छोटे साव को माल देते हैं. बताया जाता है कि छोटे-छोटे माफिया तिलैया में माइका का कारोबार करनेवाले लोगों को माल की सप्लाइ देते हैं. इसमें शहर के बड़े-बड़े लोग शामिल हैं. इनका गोदाम बीच बाजार में संचालित हो रहा है. बावजूद खनन विभाग चुप्पी साधे रहता है.

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