हलुदबनी में हर्षोल्लास से मना आनंद और उल्लास का प्रतीक बाहा पर्व
Baha Parv Celebrated in Jamshedpur: पूर्वी सिंहभूम के जमशेदपुर से सटे हलुदबनी में आनंद और उल्लास का प्रतीक बाहा पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. इसमें पूर्व सांसद भी शामिल हुए.
Baha Parv Celebrated in Jamshedpur: पूर्वी सिंहभूम जिले में जमशेदपुर के परसुडीह क्षेत्र के हलुदबनी में गुरुवार को बाहा पर्व मनाया गया. नायके बाबा मनु मार्डी ने हलुदबनी के तिलकागढ़ स्थित जाहेरथान में गांव व समाज की उन्नति और प्रगति के लिए पूजा-अर्चना की. नायके बाबा ने मरांगबुरु-जाहेरआयो का आह्वान कर उन्हें प्रकृति से प्राप्त सखुआ(सरजोम बाहा) अर्पित किया. उसके बाद नायके बाबा और कुड़ाम नायके ने हलुदबनी क्षेत्र के तिलकागढ़, पाड़ाटोला, बाघाडेरा, डुंगरीटोला, बागानटोला, छुटकीटोला समेत अन्य बस्तियों से आये सैकड़ों महिला-पुरुषों के बीच देवी-देवताओं के आशीर्वाद के रूप में सरजोम बाहा वितरित किया. महिलाओं ने देवी-देवताओं के आशीर्वाद के रूप में सरजोम बाहा को अपने जूड़े में सजाया. पुरुषों ने सरजोम बाहा को अपने कान में सजाया.
अखड़ा में सामूहिक बाहा नृत्य का हुआ शुभारंभ
इस दौरान विभिन्न बस्तियों से आये लोगों ने जाहेरथान में नतमस्तक होकर अपने परिवार की उन्नति, प्रगति व सुख-शांति का आशीष मांगा. सूर्य ढलने से पूर्व ग्रामीणों ने मांदर और नगाड़े की थाप पर सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने बाहा नृत्य करते और गीत गाते हुए नायके बाबा मनु मार्डी को पाड़ाटोला स्थित उनके आवास तक पहुंचाया. नायके बाबा को उनके आवास पर पहुंचाने के बाद गांव के अखड़ा में सामूहिक बाहा नृत्य का शुभारंभ हुआ. देर रात तक मांद और नगाड़े की थाप पर नृत्य कर समाज के लोगों ने बाहा पर्व का आनंद लिया.
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पूर्व सांसद कृष्णा मार्डी भी हुए शामिल
पूर्व सांसद कृष्णा मार्डी ने तिलकागढ़ स्थित जाहेरथान पहुंचकर मरांगबुरू-जाहेरआयो के चरणों में श्रद्धापूर्वक नमन किया. नायके बाबा मनु मार्डी के कर कमलों से उन्होंने सखुआ पुष्प (सरजोम बाहा) ग्रहण कर उसे अपने कानों में धारण किया. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बाहा का शाब्दिक अर्थ ‘फूल’ है, जो आनंद और उल्लास का प्रतीक है.
सरजोम बाहा को माना जाता है पवित्र पुष्प – कृष्णा मार्डी
कृष्णा मार्डी ने कहा कि आदिवासी समाज में सरजोम बाहा को पवित्र पुष्प माना जाता है. इसे बाहा पर्व के दौरान सबसे पहले देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है. यह पर्व केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच गहरे संबंध का जीवंत प्रमाण है, जो समाज में सामूहिकता, श्रद्धा और प्राकृतिक संतुलन को संरक्षित करता है.
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