लीड... श्रमदान कर बनायी पांच किमी सड़क

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 09 Oct 2015 6:14 PM

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लीड… श्रमदान कर बनायी पांच किमी सड़क बिशुनपुर के जिलपीदह गांव सरकारी योजना से वंचितआजादी के 68 वर्ष बाद भी प्रशासन नहीं पहुंचा गांवआदिम जनजाति 36 परिवार में कोई मैट्रिक व इंटर पास नहीं9 गुम 9 में श्रमदान से सड़क बनाते ग्रामीण.9 गुम 10 में समस्या से अवगत कराते ग्रामीण.9 गुम 11 में जानकारी देती […]

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लीड… श्रमदान कर बनायी पांच किमी सड़क बिशुनपुर के जिलपीदह गांव सरकारी योजना से वंचितआजादी के 68 वर्ष बाद भी प्रशासन नहीं पहुंचा गांवआदिम जनजाति 36 परिवार में कोई मैट्रिक व इंटर पास नहीं9 गुम 9 में श्रमदान से सड़क बनाते ग्रामीण.9 गुम 10 में समस्या से अवगत कराते ग्रामीण.9 गुम 11 में जानकारी देती आदिम जजा महिला.9 गुम 12 में श्रमदान से बनायी लकड़ी की पुलिया.9 गुम 13 में चुची खेरवार गरीबी पर रोता.दुर्जय, बसंत गुमलाअशिक्षा का अभिशाप टूटे. बच्चे पढ़ कर अपना भविष्य बनायें. इसलिए ग्रामीणों ने बच्चों के स्कूल जाने के लिए पांच किमी सड़क श्रमदान कर बनायी. यह हकीकत कहानी बिशुनपुर प्रखंड से 50 किमी दूर जिलपीदह गांव की है. यहां आदिम जनजाति बिरजिया के 36 परिवार रहते है. इनकी आबादी 300 है. झारखंड का यह पहला गांव है. जहां आजादी के 68 साल बाद भी प्रशासन नहीं पहुंचा है. यहां कोई मैट्रिक व इंटर पास नहीं है. जिलपीदह से पांच किमी की दूरी पर उपर हपाद गांव है. जहां प्राइमरी स्कूल है. स्कूल तक जाने के लिए सड़क नहीं है. सिर्फ पहाड़ है. गांव में 50 बच्चे हैं. इसमें वर्ष 2015 के नये सत्र में 10 बच्चों का स्कूल में नामांकन अभिभावकों ने कराया. लेकिन सड़क नहीं रहने से बच्चे स्कून नहीं जाते थे. इसको देख ग्रामीणों ने बीती एक माह से श्रमदान कर सड़क बना रहे हैं. जिससे बच्चे स्कूल जा सके. अभी काफी हद तक सड़क बन गयी है. बच्चे स्कूल जाना शुरू कर दिये हैं. इससे ग्रामीण खुश हैं कि अब अशिक्षा का अभिशाप टूटेगा.प्रशासन ने फरियाद नहीं सुनी: बालेश्वर बिरिजिया ने कहा कि प्रशासन से सड़क व गांव में स्कूल बनाने की मांग की थी. लेकिन फॉरेस्ट लैंड का बहाना बना कर सड़क नहीं बनायी. इसलिए गांव में बैठक करने के बाद श्रमदान से सड़क बनायी है. सड़क नहीं रहने के कारण अधिकारी नहीं आते थे. अब सड़क बन गयी. अधिकारी आसानी से आ सकते हैं.चार किमी दूर से लाते हैं पानी: गांव में न चापानल है न कुआं. गांव से चार किमी दूर चुआं है. जहां से पानी लाकर पीते हैं. वह भी पानी भी शुद्ध नहीं है. गरमी में चुआं सूख जाते है, तो नदी का पानी पीते हैं. गांव की सुनीता बिरिजिया ने बताया कि किसी प्रकार जी रहे हैं. किसी को कोई मतलब नहीं कि हम कैसे रहते हैं.पत्तल बेचते हैं व कंद मूल खाते हैं: गांव की जमीन खेती योग्य नहीं है. इसलिए गांव के लोग जंगल से पत्ता तोड़कर उसे बाजार में बेचते हैं. पत्तल बेचने से जो आमदनी होती है. उससे चूल्हा जलता है. नहीं तो जंगल से कंदमूल लाकर खाते हैं. पांच परिवार बाहर पलायन किये: बिफना बिरिजिया व गोविंद बिरिजिया ने कहा कि गांव में काम नहीं है. भूखे मरने से बचने के लिए गांव के पांच परिवार बाहर पलायन कर गये हैं. इनमें जीवन बिरिजिया, राम बिरिजिया, रामदूत बिरिजिया, चीचिंग बिरिजिया व बसिया बिरिजिया का परिवार है. ये लोग अभी कहां है, पता नहीं है.गांव की प्रमुख समस्या: गांव में बिजली नहीं है, पीने का पानी नहीं, पक्की सड़क नहीं है, खेती योग्य भूमि नहीं, वृद्धापेंशन व इंदिरा आवास नहीं मिला, बीपीएल व राशन कार्ड नहीं है. ————गांव में समस्या है. लेकिन कई काम मेरे अधिकार से बाहर थे. बिजली नहीं है. गांव में सोलर लाइट लगाने की योजना है.इंजोतपाल सिंह, मुखिया

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