कार्तिक उरांव जयंती पर विशेष : कार्तिक बाबा का गांव ही उपेक्षित, नाम लेकर चुनाव जीतते हैं नेता

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 29 Oct 2019 6:43 AM

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दुर्जय पासवान तीन बार सांसद और एक बार विधायक रहे कार्तिक उरांव के गांव को विकास के रहनुमा का इंतजार गुमला : छोटानागपुर के काला हीरा के नाम से विख्यात आदिवासियों के मसीहा स्वर्गीय कार्तिक उरांव तीन बार सांसद व एक बार विधायक रहे. आज भी वे युवाओं व वर्तमान नेताओं के प्रेरणास्रोत हैं. उनके […]

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दुर्जय पासवान

तीन बार सांसद और एक बार विधायक रहे कार्तिक उरांव के गांव को विकास के रहनुमा का इंतजार

गुमला : छोटानागपुर के काला हीरा के नाम से विख्यात आदिवासियों के मसीहा स्वर्गीय कार्तिक उरांव तीन बार सांसद व एक बार विधायक रहे. आज भी वे युवाओं व वर्तमान नेताओं के प्रेरणास्रोत हैं. उनके जीवन व काम से प्रभावित होकर कई लोगों ने राजनीति में प्रवेश किया और सांसद व विधायक बने. जरूर कार्तिक उरांव कांग्रेसी नेता थे.

लेकिन भाजपा भी उनकी सोच व काम करने के तरीके से प्रभावित रही है. परंतु जिस गांव (गुमला प्रखंड के लिटाटोली गांव) में कार्तिक उरांव ने जन्म लिया. उसी गांव को आज यहां के नेता व प्रशासन भूल गये हैं. गुमला से 10 किमी दूर लिटाटोली गांव को विकास के रहनुमा का इंतजार है. कहने को यह राज्य के सबसे बड़े मसीहा का गांव है. लेकिन गांव की जो दुर्दशा है. नेताओं की नीयत पर सवाल खड़ा करता है. गांव की सड़क जर्जर है, गांव में 17 साल से बन रहा पंचायत भवन आज भी अधूरा है. ग्रामीण कहते हैं है कि अधिकारी भवन का आधा पैसा खा गये हैं. इसलिए भवन अधूरा बना कर छोड़ दिया.

गांव का आंगनबाड़ी केंद्र आठ साल से अधूरा. अब भवन के चारों ओर झाड़ी उग आयी है. सरकार कहती है हर घर में शौचालय बने, कोई खुले में शौच नहीं करें, लेकिन लिटाटोली गांव की कहानी अलग है. यहां आधी से ज्यादा आबादी खुले में शौच को विवश है. तालाब व नदी के किनारे लोगों को शौच करते देखा जा सकता है.ॉहर साल कार्तिक जयंती पर 29 अक्तूबर को यहां नेताओं की भीड़ उमड़ती है. समय समय पर प्रशासनिक अधिकारी गांव जाते हैं. लेकिन किसी ने गांव की समस्या दूर करने की पहल नहीं की.

बंद होने के कगार पर पहुंचा स्कूल

लिटाटोली हाइस्कूल बंद होने के कगार पर पहुंच गया है. क्योंकि भवन जर्जर हो गया है और जहां-तहां से टूट-टूट कर गिर रहा है. 7वीं व 8वीं कक्षा में पढ़ाई बंद हो गयी है. क्योंकि जर्जर भवन के कारण इन दोनों कक्षाओं में छात्रों ने नामांकन लेना बंद कर दिया. अभी सिर्फ 9वीं व 10वीं कक्षा में पढ़ाई हो रही है. उसमें भी छात्र संख्या घट रही है. स्कूल भवन जर्जर होने के अलावा यहां शौचालय, पानी, बिजली, कंप्यूटर, खेल ग्राउंड की समस्या है. कई महत्वपूर्ण विषय के शिक्षक भी नहीं हैं.

उपेक्षित है लिटाटोली गांव : ललिता

महिला मंडल की अध्यक्ष ललिता देवी ने कहा कि लिटाटोली गांव आज भी उपेक्षित है. सभी सरकारी भवन अधूरे पड़े हैं. यहां तक कि स्वर्गीय कार्तिक उरांव के नाम से संचालित सरकारी लिटाटोली स्कूल भी बंद होने के कगार पर पहुंच गया है. भवन टूट कर गिर रहा है. जिस कारण बच्चे स्कूल जाना नहीं चाहते. इस क्षेत्र के लोग अब नशापान में फंसते जा रहे हैं. स्कूली बच्चे भी नशापान की गिरफ्त में आ रहे हैं. सरकार को इस गांव के विकास के लिए पहल करनी चाहिए.

कार्तिक उरांव नौ वर्षो तक विदेश में रहे

गुमला जिला के लिटाटोली गांव में 29 अक्तूबर 1924 को कार्तिक उरांव का जन्म हुआ था. कार्तिक उरांव ने 1959 ईस्वी में दुनिया के सबसे बड़े ऑटोमैटिक पावर स्टेशन का प्रारूप ब्रिटिश सरकार को दिया था, जो आज हिंकले न्यूक्लीयर पावर प्लांट के नाम से विद्यमान है.

1968 में जब भूदान आंदोलन तेज था. आदिवासियों की जमीन कौड़ी के भाव बिक रही थी. ऐसे समय में कार्तिक उरांव ने इंदिरा गांधी से अपील की कि आदिवासियों की जमीन लूटने व आदिवासियों को भूमिहीन होने से सरकार बचाये. कार्तिक उरांव नौ वर्षो तक विदेश में रहे. विदेश प्रवास के बाद 1961 के मई माह में एक कुशल व दक्ष अभियंता के रूप में स्वदेश लौटे. उन्होंने रांची के एचईसी में सुपरीटेंडेंट कंस्ट्रक्शन डिजाइनर व डिप्टी चीफ इंजीनियर डिजाइनर के पद पर काम किया.

आदिवासियों की स्थिति देख राजनीति में आये थे

विदेश से पढ़ कर जब कार्तिक उरांव देश लौटे, तो उस समय छोटानागपुर के आदिवासियों की हालत को देख कार्तिक उरांव ने समाज के लिए काम करने का दृढ़ संकल्प लिया और 1962 में एचइसी के बड़े पद को छोड़ राजनीति में प्रवेश किया.

कार्तिक उरांव ने 1962 में कांग्रेस के टिकट पर लोहरदगा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा. वह चुनाव हार गये पर हिम्मत नहीं हारी. 1967 के आम चुनाव में पुन: वे प्रत्याशी बने और भारी मतों से विजयी हुए. इसके बाद वे 1971 व 1980 के लोकसभा चुनाव में सांसद बने. 1977 में भी वे चुनाव लड़े थे. लेकिन हार गये. लोकसभा में हारने के बाद 1977 में उन्होंने बिशुनपुर विधानसभा से चुनाव लड़ा और भारी मतों से विजयी हुए थे.

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