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गुमला विधानसभा : कैसे बदलता गया चुनाव, साइकिल-बैलगाड़ी था प्रचार का सहारा, पैसा बचने पर पार्टी को लौटा देते थे उम्मीदवार

Updated at : 14 Mar 2019 8:37 AM (IST)
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गुमला विधानसभा : कैसे बदलता गया चुनाव, साइकिल-बैलगाड़ी था प्रचार का सहारा, पैसा बचने पर पार्टी को लौटा देते थे उम्मीदवार

दुर्जय पासवान गुमला : गुमला विधानसभा से तीन बार के विधायक रहे बैरागी उरांव अब 76 साल के हो गये हैं. केओ कॉलेज गुमला में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर रहते हुए उन्होंने गुमला विधानसभा से चुनाव जीता था. वे एकमात्र विधायक थे, जिन्होंने लगातार तीन बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. बैरागी उरांव 1972, 1980 व […]

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दुर्जय पासवान
गुमला : गुमला विधानसभा से तीन बार के विधायक रहे बैरागी उरांव अब 76 साल के हो गये हैं. केओ कॉलेज गुमला में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर रहते हुए उन्होंने गुमला विधानसभा से चुनाव जीता था. वे एकमात्र विधायक थे, जिन्होंने लगातार तीन बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. बैरागी उरांव 1972, 1980 व 1985 में चुनाव जीतकर विधायक बने थे. श्री उरांव बताते हैं कि 1972 में जब चुनाव हुआ था, उस समय गुमला में चार पहिया गाड़ी शहर में मात्र दो लोगों के पास हुआ करती थी.
एक चंदर साव व दूसरा घुड़ा भगत के पास. इन लोगों के पास जीप गाड़ी थी. एक दिन के चुनाव प्रचार के लिए ये लोग 60 रुपये भाड़ा लेते थे. जब मैं चुनाव लड़ा था, तो साइकिल से प्रचार करता था. उस समय गुमला विधानसभा में गुमला, कामडारा व बसिया प्रखंड आता था. चूंकि कॉलेज में पढ़ा रहा था, तो गुमला में ही रहता था.
जबकि मेरा घर चैनपुर प्रखंड में है. गुमला से मैं बसिया व कामडारा प्रखंड के कई दुर्गम गांवों में 60 से 70 किमी दूर तक साइकिल से ही प्रचार करने निकल जाता था. रात को कई गांवों में प्रचार के दौरान रुक जाता था. उस समय प्रचार करने का मजा ही अलग था. जिस गांव में रात हो जाती थी, वहीं मेहमानी में रुक जाता था.
1972 के चुनाव में किया था 30 हजार रुपये खर्च
बैरागी उरांव बताते हैं कि वर्ष 1972 के चुनाव में उन्होंने 30 हजार रुपये खर्च किया था. उस समय झारखंड पार्टी व जनसंघ भी बड़ी पार्टी हुआ करती थी. बैरागी उरांव कहते हैं कि अब तो फ्रॉड लोग विधायक व सांसद बनते हैं. करोड़ों रुपये खर्च कर चुनाव जीतते हैं. इसके बाद जनता का काम करना छोड़ कमीशन खाने में लग जाते हैं.
पैदल व साइकिल से गांव-गांव घूम होता था प्रचार
सुमति और कार्तिक उरांव की बेटी गीताश्री उरांव पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताती है कि जब उनके पिता व मां चुनाव लड़ते थे, तो उस समय पार्टी चुनाव खर्च के लिए पांच हजार रुपये देती थी. इसमें भी पैसा बच जाता था. इसे मेरे माता-पिता पार्टी को वापस लौटा देते थे. उस समय मेरे पिता साइकिल से चुनाव प्रचार किया करते थे. मां राजनीति में आयी, तो वह भी चुनाव प्रचार के दौरान पैदल ही गांव-गांव घूमा करती थी. उस समय बैलगाड़ी का उपयोग एक गांव से दूसरे गांव जाने के लिए किया जाता था.
1981 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की उम्मीदवार सुमति उरांव पैदल ही गांव-गांव चलकर मतदाताओं से संपर्क साधती थीं इनसेट में गुमला से लगातार तीन बार विधायक रहे बैरागी उरांव.
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