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बेकार पड़े हैं दो दर्जन से ज्यादा वेंटिलेटर, गंभीर मरीजों को ऑक्सीजन लगा कर दिया जाता है रेफर

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
गंभीर मरीजों को ऑक्सीजन लगा कर दिया जाता है रेफर
गंभीर मरीजों को ऑक्सीजन लगा कर दिया जाता है रेफर
प्रतीकात्मक तस्वीर

धनबाद : कोरोना संक्रमित गंभीर मरीजों के उपचार केलिए बने डेडिकेटेड कोविड अस्पताल (सेंट्रल अस्पताल) में मरीजों को वेंटिलेटर पर नहीं डाला जा रहा है. यहां ऐसे मरीजों को इंट्यूबेशन डाल कर उपचार करने के बजाय ऑक्सीजन लगा कर धनबाद से बाहर रेफर कर दिया जा रहा है. इतने बड़े अस्पताल में सिर्फ छह बेड की आइसीयू है, जिसमें चार का ही उपयोग हो रहा है. साथ ही अस्पताल में दो दर्जन से ज्यादा नये वेंटिलेटर बेकार पड़े हैं.

बीसीसीएल की ओर से संचालित सेंट्रल अस्पताल एक समय धनबाद ही नहीं, आस-पास के कई जिलों का सबसे बड़ा अस्पताल था. आज भी इतनी आधारभूत संरचनाएं किसी अस्पताल के पास नहीं है. जिला प्रशासन ने अप्रैल में इस अस्पताल के एक भाग का अधिग्रहण कर एक सौ बेड का कोविड अस्पताल बनाया गया. हालांकि, यहां पर चिकित्सीय व्यवस्था बीसीसीएल के पास ही है.

कोविड अस्पताल धनबाद का हाल

  • सिर्फ चार आइसीयू बेड से चल रहा काम

  • एक भी मरीज को इंट्यूबेशन से नहीं दी गयी ऑक्सीजन

  • वीआइपी और संपन्न लोगों को उनकी इच्छा के अनुसार कर दिया जाता है रेफर

बाद के दिनों में जिला प्रशासन ने कई नये कोविड केयर सेंटर बनाये. अब डेडिकेटेड कोविड अस्पताल में केवल गंभीर या लक्षण वाले कोविड मरीजों को ही भेजा जाता है. अस्पताल में क्षमता से कम ही मरीज रह रहे हैं. इसके बावजूद थोड़ी सी भी स्थिति बिगड़ने पर मरीज को रिम्स या किसी दूसरे अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है.

ऑक्सीजन सिलिंडर से एक की हो चुकी है मौत : सूत्रों के अनुसार अस्पताल के मरीजों को ऑक्सीजन लगाने के लिए भी स्टॉफ जल्दी नहीं जाते. मरीजों तक सिलिंडर पहुंचा कर खुद से लगाने को कह दिया जाता है. 31 जुलाई को झरिया का एक मरीज जब खुद से ऑक्सीजन सिलिंडर लगा रहा था, तब वह फट गया. इससे उसकी तत्काल मौत हो गयी. हालांकि, अस्पताल प्रबंधन ने इस घटना को गलत बताया था. कहा था कि मरीज की हालत गंभीर थी. उस मरीज को भी रिम्स रेफर किया गया था. लेकिन, परिजन जब तक ले जाने की व्यवस्था करते, वह चल बसा.

वीआइपी व पहुंच वाले मरीज हो जाते हैं रेफर : टुंडी के विधायक मथुरा प्रसाद महतो कोरोना से ग्रसित होने के बाद कोविड अस्पताल में भर्ती हुए. एक सप्ताह तक इलाज के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो उन्हें टीएमएच जमशेदपुर रेफर कर दिया गया. बीसीसीएल के जीएमपी एके दुबे कोरोना पॉजिटिव हुए तो उन्हें भी दो दिन बाद कोलकाता रेफर कर दिया गया. ऐसे दर्जनों मरीज हैं जिन्हें यहां से दूसरे अस्पतालों में रेफर किया गया. यहां पर रेफर का सिलसिला प्राय: रोज चलता है.

वेंटिलेटर पर डालने से परहेज करते हैं चिकित्सक : सूत्रों के अनुसार अब तक कोविड अस्पताल में एक भी गंभीर मरीज को इंट्यूबेशन (पाइप के जरिये फेफड़े तक ऑक्सीजन पहुंचाना) नहीं डाला गया. इसमें मरीज से बिल्कुल सट कर मुंह के जरिये पाइप डाला जाता है. इसके चलते संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है. इस कारण यहां के डॉक्टर इसके प्रयोग से बचते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि ट्रेंड नर्सिंग स्टॉफ की कमी के कारण इंट्यूबेशन नहीं किया जा रहा. क्योंकि ऐसे मरीजों को नियमित देख-रेख की जरूरत होती है.

हर आधा घंटा पर ट्यूब की पाइप को साफ करना पड़ता है. यह सब करने के लिए कोई तैयार नहीं है. मरीज का ऑक्सीजन लेवल कम होते ही सिलिंडर के जरिये ऑक्सीजन दिया जाता है. जिस मरीज की आर्थिक स्थिति थोड़ी अच्छी रहती है, उसे बड़े निजी अस्पतालों में, तथा जिनकी खराब रहती है उन्हें रिम्स रेफर कर दिया जाता है. जिस मरीज के परिजन बाहर ले जाने में समर्थ नहीं रहते हैं उसकी मौत हो जाती है.

संसाधन का नहीं हो पा रहा इस्तेमाल : कोविड अस्पताल में कई आइसीयू हैं. लेकिन, फिलहाल सिर्फ एक ही आइसीयू यूनिट चालू है. उपायुक्त उमा शंकर सिंह के अनुसार कोविड अस्पताल में चार आइसीयू बेड ही काम कर रहा है. धनबाद जैसे बड़े जिले के लिए यह नाकाफी है. जबकि पीएमसीएच कैथ लैब में जिला प्रशासन ने 30 बेड की नयी आइसीयू बना दी है. दूसरी ओर कोविड अस्पताल में जिला प्रशासन तथा विभिन्न संस्थानों से प्राप्त दो दर्जन से ज्यादा वेंटिलेटर का प्रयोग ही नहीं हुआ. ऑक्सीजन की पाइप लाइन तक नहीं लगायी गयी है.

क्या होना चाहिए, क्या हो रहा

  • सभी मरीजों के पल्स व ऑक्सीजन लेवल की जांच के लिए ऑक्सीमीटर होना चाहिए. यहां पूरे एक सौ बेड के अस्पताल में मात्र चार ऑक्सीमीटर है. उसमें भी दो काम नहीं करता.

  • पाइप लाइन के जरिये ऑक्सीजन की आपूर्ति की व्यवस्था होनी चाहिए. मगर सिलिंडर के जरिये होता है. वह भी अनमने तरीके से.

  • गंभीर मरीजों को वेंटिलेटर पर रखने की जरूरत है. यहां केवल चार वेंटिलेटर कार्यरत है. बाकी बेकार पड़ा हुआ है.

  • शौचालय, वार्ड की नियमित सफाई व सैनिटाइजेशन होना चाहिए. हर जगह गंदगी का आलम है. मरीजों द्वारा लगातार ऐसी तस्वीरें शेयर की जाती रही हैं.

  • जीवन रक्षक दवाइयां रहते हुए भी मरीजों को सही तरीके से नहीं मिल पाती है. कार्टून में पुड़िया बना कर दवाइयां वार्ड में एक जगह रख दी जाती है. मरीजों को खुद दवाइयां लेनी पड़ती है.

  • डॉक्टर जल्द वार्डों में राउंड पर नहीं जाते. हाजिरी बना कर अपने चेंबर में ही रहते हैं. इसका प्रमाण है कि मरीजों के बीएचटी पर चल रही दवाइयां की हिस्ट्री भी नहीं रहती. सीसीटीवी कैमरा में भी राउंड पर डॉक्टरों के बहुत कम जाने की पुष्टि हुई है. जबकि डॉक्टरों को नियमित रूप से वार्डों में जाना है. गंभीर मरीजों की लगातार मॉनिटरिंग करनी है.

Post by : Pritish Sahay

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