देवघर: संताल परगना के प्रथम उर्दू शायर अख्तर मधुपुरी के व्यक्तित्व को भुलाया नहीं जा सकता है. वे ऐसे शायर थे जिन्होंने समय की रफ्तार को पहचान कर उर्दू शायरी में एक नये ख्याल को जन्म दिया. अख्तर साहब शायरी की तमाम इसनाफ में शायरी करते थे. गजल, नज्म, कत्ता, रूबाई, दोहे, आजाद नज्में, हम्द, नात एवं मोशिया पढ़ते थे.
उन्होंने उर्दू को कानूनी दर्जा दिलाने के लिए उर्दू अदब, गजल के दायरे को बढ़ाने व रेडियो पर उर्दू गजल नज्म के प्रसारण के लिए जद्दोजहद की. भागलपुर स्टेशन से उर्दू प्रोग्राम का प्रसारण आरंभ कराया. इस दौरान तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने मधुपुर दौरे पर उनको सम्मानित किया तथा संताल परगना में कांटों के बीच गुलाब के खिताब से नवाजा. अख्तर मधुपुरी अपनी गजल व नज्मों को कलमबंद कर किताबी शक्ल दी तथा पहली किताब ‘सहरे-निगारा के आसपास’ प्रकाशित हुई.
वहीं दूसरी किताब ‘प्यार की बु-बास’ के लिए बिहार सरकार ने 1997 में ग्रंथ अनुदार राशि से पुरस्कृत (मरणोपरांत) किया. इसके अलावा ‘गमे दौरा गमे जाना’ व ‘गुम्बदे खिजरा के आसपास ‘ किताब भी प्रकाशित हुई.
परिचय
अख्तर मधुपुरी का जन्म मधुपुर के लखना मुहल्ला में 18 जनवरी 1929 को हुआ. इनका पूरा नाम मो शहुदुल हक अख्तर अंसारी था. वर्ष 1946 में एडवर्ड जार्ज स्कूल से मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद पटना विवि से आइए की पढ़ाई की. 1948 में जमालपुर में टिकट कलेक्टर के रूप में पदस्थापित हुए. वर्ष 1945-46 के आसपास अख्तर मधुपुरी ने मुशायरे में शिरकत कर सबसे कम उम्र के शायर के रूप में पहचान बनायी. 10 फरवरी 1996 को उनका निधन हुआ.
अख्तर साहब की रूमानियत की झलक उनके शेर से मिलती है
‘तब्बसुम उनके होठों पर तड़प है मेरे सीने में
कहां बिजली चमकती है, कहां मालूम होती है ”
उन्होंने संताल परगना की धरती के प्राकृतिक नजारों का भी खूबसुरती से चित्रण किया है :
”चमन हारे गुल वो लाला यहां है
नये रंगीन का मधुशाला यहां है
फसुने जुल्फ बंगाला यहां है
जमीन के चांद का हाला यहां है
मुकामे जलवा हाये हुर है ये
हमारा शहर मधुपुर है ये”