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पोषाहार से हैं वंचित है झारखंडी महिलाएं, लगभग 50 प्रतिशत का वजन 40 किलो से भी कम

Updated at : 29 Jun 2017 11:30 AM (IST)
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पोषाहार से हैं वंचित है झारखंडी महिलाएं, लगभग 50 प्रतिशत का वजन 40 किलो से भी कम

-रजनीश आनंद- झारखंड प्रदेश की कुल आबादी लगभग 32.96 मिलियन है. जिसमें से महिलाओं की आबादी 16.03 मिलियन है. प्रदेश की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है लेकिन उनके स्वास्थ्य पर अगर हम ध्यान दें तो चौंकाने वाले आंकड़े हमारे सामने उपस्थित होंगे. झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार मां बनने वाली 90 प्रतिशत महिलाएं […]

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-रजनीश आनंद-

झारखंड प्रदेश की कुल आबादी लगभग 32.96 मिलियन है. जिसमें से महिलाओं की आबादी 16.03 मिलियन है. प्रदेश की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है लेकिन उनके स्वास्थ्य पर अगर हम ध्यान दें तो चौंकाने वाले आंकड़े हमारे सामने उपस्थित होंगे. झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार मां बनने वाली 90 प्रतिशत महिलाएं स्वास्थ्य और पोषाहार संबंधी जानकारियों से अनिभज्ञ हैं. जिसके कारण यहां प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत देश में सबसे ज्यादा होती है. आंकड़ों की अगर मानें तो मात्र 8.6 प्रतिशत महिलाएं यह जानती हैं कि गर्भावस्था के दौरान पोषाहार किस तरह का हो. स्तनपान कैसे कराये जाये और बच्चों को किस तरह पोषित किया जाये. पूरे देश में सबसे ज्यादा एनीमिया के मरीज झारखंड में हैं और इसका सबसे बड़ा कारण पोषाहार की कमी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एनीमिया के कारण लोगों के कार्य करने की शक्ति प्रभावित होती है और एनीमिया के कारण गर्भवती माताओं की जान तक चली जाती है.

कुपोषित मांताएं देती हैं कमजोर बच्चों को जन्म
स्वास्थ्य के प्रति महिलाओं की इस उदासीनता के कारण कुपोषण और प्रसव के दौरान गर्भवती स्त्रियों की मौत की घटनाएं बहुत ज्यादा होती हैं. एक कुपोषित महिला जब एक बच्चे को जन्म देती है, तो स्वाभाविक है कि उसका बच्चा भी कुपोषित पैदा होता है. इन कमजोर बच्चों में जीवन की संभावनाएं कम होती हैं और अकसर यह देखा गया है कि 0-5 वर्ष तक के बच्चों की मौत बहुत अधिक होती है. झारखंड में 100,000 बच्चों को जन्म देने के दौरान 208 माताओं की मौत हो जाती है. जबकि राष्ट्रीय दर 178 का है.
पोषाहार से वंचित हैं महिलाएं
झारखंड में 47.8 प्रतिशत महिलाएं अंडरवेट हैं. उनका वजन मात्र 40 किलो है. जो उनके शरीर के कुपोषित होने का उदाहरण है. झारखंड के ग्रामीण इलाकों में गरीबी बहुत ज्यादा है. अत: महिलाओं को संतुलित भोजन नहीं मिल पाता है. रोज उनके खाने की बात की जाये तो उनकी थाली में नमक-भारत के अलावा और कुछ नहीं होता. बहुत ज्यादा हुआ तो वे टमाटर को आग में पका कर अपने भोजन में शामिल करती हैं. दाल-भात-सब्जी खाना उनके नसीब में नहीं होता है. पोषाहार के प्रति अनभिज्ञता के कारण भी वे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देती हैं. जिसके कारण खून की कमी या एनीमिया होना यहां आम बात है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार पूरे देश में सबसे ज्यादा झारखंड की महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं. पूरे देश में लगभग 59 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं जबकि झारखंड में यह आंकड़ा 70.6 प्रतिशत है. एनेमिक महिलाओं में 15 से 49 वर्ष की महिलाएं शामिल हैं. झारखंडी महिलाओं में खून की कमी का सबसे बड़ा कारण इनका खानपान है.
आंगनबाड़ी केंद्रों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में
ग्रामीण इलाकों में आंगनबाड़ी केंद्र पर स्वास्थ्य संबंधित तमाम बातों की जिम्मेदारी होती है. गर्भवती स्त्री का पंजीकरण, उसे पोषाहर उपलब्ध कराना, उसका टीकाकरण जैसे काम केंद्र के जिम्मे ही होता है, लेकिन जब केंद्र सही तरीके से काम नहीं करता है तो ग्रामीण महिलाओं का स्वास्थ्य सवालों के घेरे में आ जाता है. आंकड़ें बताते हैं कि प्रदेश में आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिये रेडी टू इट पोषाहार का वितरण किया जाता है, जो कुपोषित बच्चों, गर्भवती और धात्री महिलाओं के लिए होता है. लेकिन इस पोषाहार का वितरण भी सही तरीके से नहीं हो पाता है. एनीमिया से निपटना सरकार के लिए प्रदेश में चुनौती है. लड़कियों को आयरन की गोली इसी से निपटने के लिए मुहैया करायी जाती है, लेकिन उसका भी वितरण सही ढंग से नहीं हो पाता है.
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