मन मांगी मुरादें पूरी करती हैं वैष्णवी माता

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त्रिवेणीगंज : मुख्य बाजार स्थित वैष्णवी मां दुर्गे की ख्याति दूर -दूर तक फैली हुई है. कहते हैं कि जो भी भक्त मां के दरवार में सच्चे मन से पूजा -अर्चना करता है , माता उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी करती है. प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी दशहरा के मौके पर मां दुर्गें की […]

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त्रिवेणीगंज : मुख्य बाजार स्थित वैष्णवी मां दुर्गे की ख्याति दूर -दूर तक फैली हुई है. कहते हैं कि जो भी भक्त मां के दरवार में सच्चे मन से पूजा -अर्चना करता है , माता उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी करती है. प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी दशहरा के मौके पर मां दुर्गें की पूरे विधि विधान के साथ पूजा -अर्चना की जा रही है. सप्तमी पूजा के बाद मंदिर का पट खुलते ही यहां दर्शन व पूजन करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है.

या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम: जैसे मंत्रोच्चार से पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा है. दुर्गा पूजा को लेकर लोगों में काफी उत्साह व उल्लास का माहौल देखा जा रहा है. 49 वर्ष पूर्व हुई थी मंदिर की स्थापना वैष्णवी मां दुर्गा मंदिर की स्थापना करीब 49 वर्ष पूर्व स्थानीय लोगों के सहयोग से की गयी थी.

बताया जाता है कि वर्ष 1966 में इस मंदिर का स्थापना हेतु लोगों ने पहल की थी. बाजार वासियों के मुताबिक मंदिर के लिए जमीन हेतु स्थानीय स्व लक्ष्मी प्रसाद साह से संपर्क किया गया था. लेकिन उन्होंने यह कह कर प्रस्ताव ठुकरा दिया कि उक्त जमीन पर हनुमानजी का मंदिर स्थापित किया जायेगा. लेकिन उसी रात श्री साह की धर्मपत्नी स्व तारा देवी को रात में माता ने स्वप्न देकर उक्त स्थल पर भगवती के मंदिर की स्थापना का आदेश दिया.

सुबह जब पत्नी ने श्री साह को स्वप्न की बात बतायी तो उन्होंने ग्रामीणों के पास जाकर जमीन दान देने का प्रस्ताव रखा. जिसके बाद ग्रामीणों के सहयोग से इस मंदिर की स्थापना की गयी. शुरुआती दौर में कच्चे व चदरे के घर में पूजा -अर्चना प्रारंभ की गयी. बाद में यहां भव्य मंदिर का निर्माण किया गया. मंदिर परिसर में हनुमानजी एवं शिवजी का भी मंदिर बनाया गया है. मंदिर आने वाले भक्त तीनों देवी -देवताओं की श्रद्धा पूर्वक पूजा – आराधना करते हैं. भक्ति का सागर मंदिर परिसर में प्रखंड अंतर्गत डपरखा वार्ड नंबर 09 निवासी सुनीता देवी एवं पड़तापुर वार्ड नंबर 04 निवासी प्रमिला देवी ने हाथ पर कलश स्थापित कर भक्ति की पराकाष्ठा का उदाहरण पेश किया है. बताया जाता है कि माता से मांगी गयी मन्नत पूरा होने के बाद उन्होंने इस प्रकार के कठोर साधना का व्रत लिया है.

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