जीवों पर दया नहीं, शिव भाव से करें सेवा

Published at :09 Jan 2016 7:08 PM (IST)
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जीवों पर दया नहीं, शिव भाव से करें सेवा

जीवों पर दया नहीं, शिव भाव से करें सेवा नोट. फोटो नंबर 9 सीएचपी 16 है. कैप्सन होगा- श्रद्धालुओं को संबोधित करते स्वामी जी संवाददाता-छपरा. स्थानीय रामकृष्ण मिशन आश्रम में आयोजित रामचरित मानस के आधार पर श्री हनुमान एवं स्वामी विवेकानंद की तुलना विषयक चर्चा के तीसरे दिन बनारस से पधारे रामकृष्ण संघ के वरिष्ठ […]

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जीवों पर दया नहीं, शिव भाव से करें सेवा नोट. फोटो नंबर 9 सीएचपी 16 है. कैप्सन होगा- श्रद्धालुओं को संबोधित करते स्वामी जी संवाददाता-छपरा. स्थानीय रामकृष्ण मिशन आश्रम में आयोजित रामचरित मानस के आधार पर श्री हनुमान एवं स्वामी विवेकानंद की तुलना विषयक चर्चा के तीसरे दिन बनारस से पधारे रामकृष्ण संघ के वरिष्ठ संन्यासी स्वामी निखिलाभानंद जी ने कहा कि गिद्वों में आपार दृष्टि होती है और यही कारण था कि जटायु नामक गिद्ध ने हनुमान की सेना को समुंद्र पार अशोक वाटिका में सीता का पता बताया था. श्री हनुमान में उपस्थित शक्ति की विशेषता बताते हुए उन्होंने कहा कि जब जामवंत ने उनसे कहा कि तुम पवन पुत्र थे, जब उन्हें अपनी शक्ति का मान हुआ. इसके बाद ही वे समुंद्र पार करते हैं. इसी प्रकार विवेकानंद जी भारत माता को अंग्रेजों से मुक्त कराने हेतु समुंद्र पार करके अमेरिका जाते हैं. दोनों ही न केवल समुंद्र पार करते है, बल्कि कठोर साधना करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करते है. स्वामी जी के गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद से कहा था कि भारत के लोग भूख से तड़प रहे है और भूखे पेट धर्म कार्य संभव नहीं है. अत: तुम्हें जीवों पर दया नहीं, शिव भाव से उनकी सेवा करने की आवश्यकता है. इसी के बाद विवेकानंद रामकृष्ण संघ की स्थापना करके भारत भ्रमण पर निकल कर देश की स्थिति का पता करते हैं. अंतत: दक्षिण स्थित कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा करने के बाद समुंद्र के चट्टान पर तैर कर पहुंचते है तथा ध्यान मग्न होते हैं. ध्यान में उन्हें लगा कि धर्म को सही रूप में नहीं जानने के कारण देश की यह स्थिति है. इसी स्थान से विवेकानंद अमेरिका जाने का निर्णय लेते हैं. स्वामी ने कहा कि जिस प्रकार श्री हनुमान को लंका पहुंचने में सुरसा तथा अन्य बाधाओं को पार करना पड़ा था, वैसे ही विवेकानंद को उनके सुंदर युवतियों के प्रलोभन से बचते हुए अमेरिका में वेदांत का प्रचार कर हिंदू धर्म की विशेषताओं का प्रचार करना पड़ा था.

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