राज्यसभा चुनाव : इस बार मुस्लिम को नहीं मिला रास जाने का मौका
Author : Pritish Sahay Published by : Prabhat Khabar Updated At : 15 Mar 2020 5:24 AM
राज्यसभा चुनाव में इस बार अरसे बाद किसी अल्पसंख्यक उम्मीदवार को मौका नहीं मिल पाया. राज्यसभा में बिहार से सोलह सदस्यों की सदस्यता निर्धारित है. चुनाव बाद एकमात्र अशफाक करीम बिहार से राज्यसभा के सदस्य रह जायेंगे. राज्यसभा के लिए अगला चुनाव इसके बाद 2022 में होना है.
पटना : राज्यसभा चुनाव में इस बार अरसे बाद किसी अल्पसंख्यक उम्मीदवार को मौका नहीं मिल पाया. राज्यसभा में बिहार से सोलह सदस्यों की सदस्यता निर्धारित है. चुनाव बाद एकमात्र अशफाक करीम बिहार से राज्यसभा के सदस्य रह जायेंगे. राज्यसभा के लिए अगला चुनाव इसके बाद 2022 में होना है. 2020 में होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत कर आने वाले विधायकों की संख्या के आधार पर अगले चुनाव में दलों की सीटें तय हो पायेंगी. फिलहाल अशफाक करीम के अलावा कहकशां परवीन नौ अप्रैल तक बिहार कोटे से राज्यसभा की सदस्य रहेंगी.
पिछले 10 सालों में अल्पसंख्यक वर्ग से राज्यसभा के लिए उम्मीदवार चुनते आये हैं. 2014 में जदयू से कहकशां परवीन, 2008 में जदयू से एजाज अली, 2011 में जदयू से ही साबिर अली, 2014 में जदयू के गुलाम रसूल बलियावी और 2006 में राजद से जाबिर हुसेन राज्यसभा के लिए चुने जा चुके हैं. राज्यसभा के तुरंत बाद विधान परिषद के चुनाव होने हैं. विधान परिषद में फिलहाल अल्पसंख्यक समुदाय के आठ सदस्य हैं. इनमें से विधानसभा कोटे की नौ सीटों में जदयू के प्रो हारूण रशीद कार्यकाल सात मई को समाप्त हो रहा है.
राजद की सवर्ण तबके को साधने की कोशिश : राजद को अमरेंद्र धारी सिंह को उम्मीदवार बनाये जाने की चाहे जो भी मजबूरी रही हो, पर वह इसके पीछे सवर्ण तबके को साधने का राजनीतिक तर्क ही दे रहा है. 2018 में प्रो मनोज कुमार झा को राज्यसभा भेज कर राजद ने माय समीकरण से बाहर निकलने की संकेत दिया था.
इसके बाद सवर्ण आरक्षण को लेकर संसद में विरोध किये जाने से राजद को लोकसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा. इसके बाद वरिष्ठ नेता जगदानंद सिंह को प्रदेश की कमान सौंपना और अब अमरेंद्र धारी सिंह को राज्यसभा का उम्मीदवार बना कर पार्टी अपनी छवि सुधरना चाहती है. इसके पहले 1998 में राजद ने सरोज दुबे को राज्यसभा में उम्मीदवार बनाया था और उन्हें जीत भी हासिल हुई थी.
कुशवाहा बिरादरी को थी भाजपा से उम्मीद : कुशवाहा बिरादरी की नजर इस बार भाजपा की ओर लगी थी. पूर्व मंत्री और भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने कहा कि भाजपा को सबका साथ-सबका विकास नारे का ख्याल रखना चाहिए था. राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार की घोषणा के बाद शहर में कई जगहों पर कुशवाहा बिरादरी की नाराजगी के स्वर पोस्टर के माध्यम से दिखे. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक प्रदेश की आबादी में कुशवाहा की ताकत आठ से 10 फीसदी मानी जाती है.
कुशवाहा बिरादरी के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा 53 सीटों पर सिमट कर रह गयी थी. आक्रामक वोटर रही कुशवाहा बिरादरी को यदि भाजपा ने अपने साथ जोड़कर नहीं रखा तो उसके स्वर्णिम काल के बावजूद चुनावी लाभ नहीं मिल पायेगा.
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