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लीची ने देश के 27 राज्यों के किसानों को एक सूत्र में बांधा

28 Nov, 2015 9:16 pm
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लीची ने देश के 27 राज्यों के किसानों को एक सूत्र में बांधा

लीची ने देश के 27 राज्यों के किसानों को एक सूत्र में बांधाकेंद्र में 30 नवंबर तक होगा लीची उत्पादकों का प्रशिक्षण लीची के एक-एक पहलु की दी जानकारी घोल बनाने, छिड़काव की विधि, ढांचा निर्माण की दी जानकारी वरीय संवाददाता, मुजफ्फरपुर लीची ने देश के 27 राज्यों के किसानों को एक सूत्र में बांध […]

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लीची ने देश के 27 राज्यों के किसानों को एक सूत्र में बांधाकेंद्र में 30 नवंबर तक होगा लीची उत्पादकों का प्रशिक्षण लीची के एक-एक पहलु की दी जानकारी घोल बनाने, छिड़काव की विधि, ढांचा निर्माण की दी जानकारी वरीय संवाददाता, मुजफ्फरपुर लीची ने देश के 27 राज्यों के किसानों को एक सूत्र में बांध दिया है. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र में चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के लगभग तमाम राज्यों के किसान यहां जुटे हैं. वैज्ञानिकों ने किसानों को तकनीकी व सैद्धांतिक जानकारी दी. बाहर से आये किसानों को लीची की खेती के सभी पहलुओं की जानकारी दी गयी. वैज्ञानिकों का मानना है कि निकट भविष्य में पूरे देश की माटी में शाही लीची रच-बस सकती है. केंद्र के निदेशक डॉ विशालनाथ नाथ ने कहा, उत्तम कृषि क्रियाओं पर प्रशिक्षण लीची के उत्पादन व उत्पादकता में बढ़ोतरी कर सकता है. 30 नवंबर तक प्रशिक्षण होगा. यह प्रशिक्षण लीची के बढ़ते प्रभाव काे देखते हुए भारत सरकार के कृषि व सहकारिता विभाग की पहल पर हुआ है. इसका मुख्य उद्देश्य लीची उत्पादक राज्यों के कृषि अधिकारियों एवं उद्यमियों काे नवीनतम जानकारियो से परिपूर्ण करना है. इसमें सात राज्यों (बिहार, उत्तराखण्ड, झारखंड, असम, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश) के प्रखंड कृषि अधिकारियाें, समन्वयकों, उद्यमियों और किसानों ने भाग लिया. केंद्र के निदेशक सह पाठयक्रम निदेशक डाॅ विशाल नाथ ने बताया कि केंद्र ने 20 राज्याें में बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पंजाब, केरल, मध्य प्रदेश नागालैण्ड, त्रिपुरा मणिपुर, सिकिक्म व जम्मू-कश्मीर भी शामिल थे. लीची में दिन-प्रतिदिन आने वाली कृषि समस्याओं के निराकरण के लिए आवश्यक ज्ञान जरूरी है. उसमें गुणात्मक सुधार के लिए जमीन से जुड़े अधिकारियों व उद्यमियाें को प्रशिक्षण में लगाया गया था. लीची की उन्नत किस्मों, उपयुक्त खेत व पौधों के चयन, सही पौधराेपण व संरक्षण, नियमित फलन, क्षत्रक प्रबंध, सिंचाई, खाद आदि के प्रयोग व कीट-व्याधि की पहचान एवं नियंत्रण के अनेक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई. पुराने बागों के जीर्णोद्धार, मधुमक्खी का प्रभावी रूप से परागण, फल झड़ने फटने, सूखने व सड़ने से नियंत्रण, माइकाेराइजा प्रयोग से पौध स्थापना व फलन सुधार आदि विषयाें पर चर्चा किया गया. प्रशिक्षणार्थियाें का विभिन्न तरह के घोल तैयार करने, छिड़काव की विधि, ढांचा निर्माण, छल्ला निर्माण, खाद एवं उर्वरक प्रयोग, जैविक खेती, सिंचाई व जल प्रबंध आदि पर प्रयोगिक जानकारी दी गयी. इस पाठ्यक्रम के समन्वयक डॉ एसडी पांडेय व डॉ सुशील कुमार पूर्वे व पाठ्यक्रम निदेशक डॉ विशाल नाथ थे.

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