बंद चीनी मिल ने कम की किसानों की जिंदगी की मिठास

Published at :29 Dec 2015 6:48 PM (IST)
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बंद चीनी मिल ने कम की किसानों की जिंदगी की मिठास

बंद चीनी मिल ने कम की किसानों की जिंदगी की मिठास फोटो – मधेपुरा 02कैप्शन – बहुपयोगी फसल होने के बाद भी उपेक्षा का दंश झेल रहा है ईंख – बनमनखी चीनी मिल . उदाकिशुनगंज क्षेत्र के किसानों ने गन्ना उत्पादन से मुंह मोड़ा- सिर्फ गुड़ बनाने के लिए ही होती है अब गन्ने की […]

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बंद चीनी मिल ने कम की किसानों की जिंदगी की मिठास फोटो – मधेपुरा 02कैप्शन – बहुपयोगी फसल होने के बाद भी उपेक्षा का दंश झेल रहा है ईंख – बनमनखी चीनी मिल . उदाकिशुनगंज क्षेत्र के किसानों ने गन्ना उत्पादन से मुंह मोड़ा- सिर्फ गुड़ बनाने के लिए ही होती है अब गन्ने की खेती – जनप्रतिनिधियों ने कई बार चीनी मिल खोलने की बात की, नतीजा सिफरप्रतिनिधि, उदाकिशुनगंजसरकारी की बेरुखी के कारण उदाकिशुनगंज अनुमंडल क्षेत्र में गन्ने की मिठास नगण्य हो चुकी है. किसान गन्ने की खेती की ओर से विमुख होते जा रहे हैं. कृषि अनुसंधानों के मुताबिक यह क्षेत्र गन्ने की खेती के लिए उपजाउ है. पूर्णिया जिले के बनमनखी में जब चीनी मिल सक्रिय थी तब बिहारीगंज स्टेशन पर जिले के उदाकिशुनगंज अनुमंडल क्षेत्र से पर्याप्त मात्रा में मिल को गन्ने की आपूर्ति की जाती थी. लेकिन चीनी मिल के बंद हो जाने के बाद इस क्षेत्र के गन्ना किसानों ने भुखमरी के कारण गन्ने की खेती काफी कम कर दी. अब जो खेती हो रही है उससे गुड़ बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. पूर्व उद्योग रेणु कुशवाहा ने इस क्षेत्र में चीनी मिल की स्थापना के लिए प्रयास किया. बिहारीगंज -उदाकिशुनगंज पथ पर मधुबन गांव के समीप भूमि का सर्वे कर चीनी मिल स्थापित करने की योजना बनायी गयी तो किसान में खुशी की लहर दौड़ गयी. लेकिन वह योजना भी फाइलों में सिमट कर रह गयी. बताया जाता है कि भूमि अधिग्रहण के काम का कुछ किसानों ने विरोध जता दिया. हालांकि वहीं लोगों का यह भी कहना है कि मिल के लिए अनुमंडल क्षेत्र में अन्य स्थानों पर भी जमीन उपलब्ध थी. लेकिन इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास नहीं किया गया अन्यथा भूमि उपलब्ध होना कोई बड़ी बात नहीं थी. किन्ही खास लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए ही मिल की योजना बनायी गयी थी. गुड़ उत्पादन में है पहचानगुड़ उत्पादन में उदाकिशुनगंज अनुमंडल की अपनी एक पहचान है. पहले यहां से गुड़ बिहार के अन्य इलाकों में जाता था. जानकारों का कहना है कि गुड़ उत्पादन में बंगाल, झारखंड, समेत कई राज्यों में यहां के किसान अपनी अलग पहचान बना चुके थे. लेकिन सरकारी स्तर पर गन्ना किसानों के लिए समर्थन मूल्य की घोषणा नहीं की जाती है. — कहते हैं किसान — बीच – बीच में किसानों को कई बार प्रशिक्षण भी दिया गया लेकिन चीनी मिल नहीं होने के कारण यह प्रशिक्षण भी नाकाम साबित होता रहा. क्षेत्र के किसान संजीव यादव, गोपाल कुमार, बासू यादव, शंभु राय आदि ने बताया कि सिर्फ प्रशिक्षण से क्या होगा. एक समय था ईख की खेती से ही परिवार का भरण पोषण हुआ करता था. — मवेशी के लिए वरदान है ईंख — वहीं ईंख की खेती मवेशी के लिए वरदान साबित होती थी. ईख की हरी पत्ती से चारा उपलब्ध होता था. इस चारे से दुधारू मवेशियों में दूध की मात्रा बढ़ जाती है. सर्दी में ईंख की पत्ती के सेवन से मवेशियों में गर्माहट भी रहती है. घर में जलावन के तौर पर भी उपयोग में आता है. कच्चा घर बनाने में भी ईंख की पत्तियों और शाखाओं का उपयोग होता है. इतनी खूबियों के बावजूद इस बहुपयोगी फसल ईख पर सरकार ध्यान देना मुनासिब नहीं समझती है. एक अदद चीनी मिल की आस में अनुमंडल क्षेत्र के लोग अब भी इंतजा र कर रहे हैं.

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