मधेपुरा :.....जब जनता दल के टिकट पर सदन पहुंचे थे रवि बाबू
Updated at : 27 Mar 2019 9:25 AM (IST)
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कुमार आशीष मधेपुरा : भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति रहे डॉ रमेंद्र कुमार यादव उर्फ रवि बाबू वर्तमान में सक्रिय राजनीति से दूर परिवार के साथ मधेपुरा में समय बीता रहे हैं. अपनी चुनावी संस्मरण को प्रभात खबर से साझा करते रवि बाबू बताते हैं कि पहली बार मधेपुरा लोकसभा से वर्ष 1980 […]
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कुमार आशीष
मधेपुरा : भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति रहे डॉ रमेंद्र कुमार यादव उर्फ रवि बाबू वर्तमान में सक्रिय राजनीति से दूर परिवार के साथ मधेपुरा में समय बीता रहे हैं. अपनी चुनावी संस्मरण को प्रभात खबर से साझा करते रवि बाबू बताते हैं कि पहली बार मधेपुरा लोकसभा से वर्ष 1980 में चुनाव लड़ने का अवसर प्राप्त हुआ था.
पहला चुनाव उन्होंने कांग्रेस (इंदिरा) के चुनाव चिह्न पर लड़ा था. उस वक्त 26 हजार मतों से अपने निकटतम प्रतिद्वंदी आरपी यादव से पराजित हुए थे. दूसरी बार जनता दल के नेता देवी लाल ने उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका दिया था. पार्टी के संसदीय बोर्ड ने टिकट देने के निर्णय पर अंतिम मुहर लगने की शरद यादव ने पहली सूचना दी थी.
उस वक्त वीपी सिंह, देवी लाल, शरद यादव व लालू प्रसाद चुनाव प्रचार करने मधेपुरा आये थे. रवि बाबू बताते हैं कि चुनाव कांग्रेस के विरोध में लड़ा गया था. उन्होंने बड़े अंतराल से महावीर प्रसाद यादव को मात दी थी. लेकिन चुनाव में हारने के बावजूद महावीर बाबू से मामा-भांजा का संबंध कायम रहा था.
सांसद बनने से पहले दो बार पहुंचे विधानसभा : रवि बाबू बताते हैं कि सांसद बनने से पहले वर्ष 1981 में मधेपुरा के सिंहेश्वर विधानसभा उपचुनाव में जीत दर्ज करने के बाद दूसरी बार 1984 में लोकदल प्रत्याशी के रूप में सिंहेश्वर से विधायक निर्वाचित हुए थे.
यह अलग तरह का दौर था. जब कांग्रेस के आवरण से निकलकर कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी के संपर्क में जाने का मौका मिला था. उस समय के चुनाव में वर्तमान में प्रचलित जाति व वर्ण आधारित उम्मीदवार व गठबंधन की परंपरा नहीं थी. पार्टी के नेता भी व्यक्तित्व को महत्व देते थे.
धन नहीं, मन से होता था चुनाव
रवि बाबू वर्तमान दौर में चुनाव के दौरान खर्च किये जाने वाले पैसे व संसाधन पर कहते हैं कि पहले चुनाव लड़ने के लिए पार्टी की तरफ से कुछ सामान्य राशि उम्मीदवार को दी जाती थी. यह राशि कार्यकर्ता चंदा के रूप में क्षेत्र के संपन्न लोगों से एकत्र करते थे. कोई रुपये तो कोई अनाज देकर अपना योगदान देता था. और इसी के सहारे चुनाव प्रचार होता था. अब धन आधारित चुनाव की गलत परंपरा देखने को मिलती है. नेता गाड़ियों के काफिले में गुजरते हैं, पहले सीएम व पीएम के आने पर वाहनों का हुजूम देखने को मिलता था.
संसदीय परंपरा से रहा गहरा जुड़ाव : एक बार सांसद व दो बार बिहार विधानसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके रवि बाबू का संसदीय परंपरा से गहरा जुड़ाव रहा है. रवि बाबू दो बार राज्यसभा के लिए भी मनोनीत हुए थे. पहली बार 1992 व दूसरी बार वर्ष 2004 में देश के उच्च सदन में बने रहे थे.
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