हर साल पलायन कर जाते हैं कोसी के मजदूर पर अब भी दिवस मनाने का कायम है दस्तूर

Updated at : 01 May 2018 7:22 AM (IST)
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हर साल पलायन कर जाते हैं कोसी के मजदूर पर अब भी दिवस मनाने का कायम है दस्तूर

मधेपुरा : आर्थिक रूप से पिछड़े कोसी इलाके को श्रमिकों का गढ़ माना जाता रहा है. लेकिन विगत कुछ वर्षों में पुरुष श्रमिकों के बढ़े पलायन ने यहां की कृषि व्यवस्था को प्रभावित किया है. हालांकि सरकार ने मजदूरों के पलायन को रोकने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी एक्ट (मनरेगा) के तहत 100 […]

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मधेपुरा : आर्थिक रूप से पिछड़े कोसी इलाके को श्रमिकों का गढ़ माना जाता रहा है. लेकिन विगत कुछ वर्षों में पुरुष श्रमिकों के बढ़े पलायन ने यहां की कृषि व्यवस्था को प्रभावित किया है. हालांकि सरकार ने मजदूरों के पलायन को रोकने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी एक्ट (मनरेगा) के तहत 100 दिन के रोजगार देने की योजना चला रखी है, लेकिन इसका नतीजा सिफर ही दिख रहा है.
नतीजतन कोसी के इलाके में कृषि कार्य महिलाओं के कंधों पर जा टिका है. पुरुष मजदूर पंजाब व अन्य प्रदेश चले गये. ऐसे में मधेपुरा सहित सुपौल व सहरसा के इलाके में मजदूर दिवस के कोई मायने नहीं है. मजदूरों के लगातार पलायन से क्षेत्र में कृषि व्यवस्था प्रभावित हुई है. मजदूर दिवस के मौके पर सार्वजनिक अवकाश व जन जागरूकता वाले कार्यक्रम के जरिए सिर्फ रस्म पूरी की जाती है. जमीनी स्तर पर पलायन को रोकने के लिए कोई काम नहीं हुए है. मधेपुरा में बने रेल इंजन कारखाना से भी स्थानीय मजदूरों की उम्मीद पूरी नहीं हुई. कुशल श्रमिकों की डिमांड में अकुशल श्रमिक पीछे छूटते जा रहे है.
आठ से नौ लाख मजदूर करते हैं पलायन . अप्रैल से जून माह के बीच तीन महीने में इस इलाके के आठ से नौ लाख पुरुष श्रमिक ज्यादा कमाई की उम्मीद लिये पंजाब व हरियाणा की तरफ चले जाते है. मजदूरों के पलायन का आलम यह रहता है कि इस समय सहरसा-अमृतसर के बीच चलने वाली जनसेवा एक्सप्रेस, जनसाधारण एक्सप्रेस में भारी भीड़ की वजह से जगह नहीं मिलने से आक्रोशित मजदूरों की फजीहत हो जाती है. कई बार सहरसा जंक्शन हंगामा भी हो चुका है. हालांकि मजदूरों की भारी भीड़ को देखते हुए रेल प्रशासन द्वारा कोसी के इलाके से अतिरिक्त ट्रेन भी परिचालित की जाती है. ऐसी हालत में बुआई से लेकर कटनी तक में मजदूरों की कमी हो जाती है.
कोसी में करीब 27 लाख जॉब कार्डधारी मजदूर
वर्ष 2010 के आंकड़ों के अनुसार प्रमंडल के सहरसा, सुपौल व मधेपुरा जिले में कृषकों की कुल संख्या सात लाख के करीब है. मजदूरों की बात करें तो प्रमंडल में सिर्फ जाबकार्ड धारी मजदूर 27,12,348 हैं. जबकि इन तीनों जिले में कुल श्रमिकों की संख्या 37 लाख के करीब है, जिनमें 12 लाख के करीब महिला श्रमिक हैं. इनके कंधे पर ही कृषि व्यवस्था जा टिकी है.
120 हजार हेक्टेयर में फसल, लक्ष्य 245 हजार हेक्टेयर
कृषि विभाग से मिली जानकारी अनुसार वर्तमान में कोसी इलाके के लोग महज 120 हजार हेक्टेयर भूमि में ही खेती करते है. जबकि लक्ष्य 245 हजार हेक्टेयर भूमि में खेती का रखा जाता है. कम खेती का एक कारण श्रमिकों की कमी भी है. श्रमिक नहीं मिलने के कारण भी बहुत से किसान खेती नहीं करना चाहते हैं.
आखिर क्या कहते हैं जिले के मजदूर
कुमारखंड प्रखंड के मजदूर श्याम ऋषिदेव बताते है कि पंजाब में मजदूरी भी ज्यादा मिलती है. इसके अलावा काम की निरंतरता बनी रहती है. जबकि स्थानीय स्तर पर कम मजदूरी व खेतों में किसान अब फसल के प्रति चिंतित नहीं रहते है. सभी लोग आधुनिकता के दौर में दूसरा व्यवसाय अपनाने लगे है. जॉब कार्ड बनने के बावजूद पंचायत में नियमित काम नहीं मिल पाता है.
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