अक्षय नवमी का पर्व मना

Published at :20 Nov 2015 6:46 PM (IST)
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अक्षय नवमी का पर्व मना

अक्षय नवमी का पर्व मना फोटो-01चित्र परिचय: अक्षय नवमी के मौके पर आंवला के वृक्ष में रक्षा सूत बांधती महिलाएं व आचार्यप्रतिनिधि, लखीसरायजिले के विभिन्न भागों में शुक्रवार को अक्षय नवमी के मौके पर महिलाओं ने आंवला वृक्ष के नीचे पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की. कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष नवमी को […]

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अक्षय नवमी का पर्व मना फोटो-01चित्र परिचय: अक्षय नवमी के मौके पर आंवला के वृक्ष में रक्षा सूत बांधती महिलाएं व आचार्यप्रतिनिधि, लखीसरायजिले के विभिन्न भागों में शुक्रवार को अक्षय नवमी के मौके पर महिलाओं ने आंवला वृक्ष के नीचे पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की. कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष नवमी को मनाया जानेवाला इस त्योहार में स्नान-दान का विशेष महत्व है. इस दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्राप्ति के समान माना जाता है. इस दिन आंवले के वृक्ष व भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. अक्षय नवमी के मौके पर सुबह से ही महिलाएं सज-धजकर आंवला वृक्ष के नीचे पूजा के लिए जुटने लगी. दीप जला कर मौली, अक्षत, पान, सुपारी, रोली, फल, पकवान आदि से आंवला वृक्ष की पूजा की. लाल सूता लपेटकर वृक्ष की परिक्रमा की. इस अवसर पर कुछ महिलाओं ने वृक्ष के नीच भोजन बनाकर ब्राह्मणों को भोजन कराने के उपरांत अपने परिवार के साथ वृक्ष के नीचे ही उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया. शास्त्रों के अनुसार आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु निवास करते हैं. साथ ही इसे श्रृष्टि के पहले वृक्ष के रूप में भी पूजा अर्चना की जाती है. ज्योतिषाचार्य उमा शंकर व्यास जी के मुताबिक इस दिन महिला व पुरुष दोनों आंवले के वृक्ष की पूजा करते हैं. इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा कर पारिवारिक सुख शांति की कामना की गयी. शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने कुष्मांडा दैत्य को मार कर संसार को उसके पापों से मुक्ति दिलायी थी. इसलिए इस दिन कुष्मांडा का दान करने की भी परंपरा है. इसे गुप्त दान भी कहते हैं. इस दिन वस्त्र, भुआ, अनाज, बरतन आदि ब्राह्मणों को दान दिया गया. कथाओं के मुताबिक सतयुग में दो ब्राहृमण भाइयों को एक ही कर्म के लिए एक को स्वर्ग व दूसरे को नरक भेजा गया. भाइयों के द्वारा इसका कारण पूछने पर भगवान चित्रगुप्त ने उन्हें बताया कि तुम दोनों में से एक भाई ने अपने जीवन काल में एक बार विधि पूर्वक अक्षय नवमी का व्रत किया. जिससे उसके सारे पाप धुल गये व उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई. सूर्यगढ़ा प्रतिनिधि के मुताबिक कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाये जाने वाले अक्षय नवमी के मौके पर शक्रवार को लोगों ने आंवला वृक्ष मे रक्षा सूत्र बांध कर अपने पापों से मुक्ति व परिवार के सुखी जीवन की कामना की. इस मौके पर आंवला वृक्ष के नीचे खिचड़ी बना कर ब्राह्मणों को खिलाया गया तथा खुद भी प्रसाद के रूप में ग्रहण किया.अक्षय नवमी के मौके पर आंवला वृक्ष को पूजन करने व रक्षा सूत्र बांधने को लेकर अहले सुबह से ही महिलाएं पवित्र स्नान कर हाथों में रोली, अक्षत, फल, फूल, भुआ (एक प्रकार की सब्जी)में चीरा लगा कर उसमें सोने, चांदी व पैसों आदि को गुप्त रूप से डाल कर ब्रह्मणों को दान दिया गया. लोगों ने ब्राह्मणों के द्वारा संकल्प कराने के बाद आंवला वृक्ष व भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की. इस तिथि को गुप्त दान करना शुभ माना जाता है. बाद में आंवला वृक्ष में रक्षा सूत्र बांध कर अपने व अपने परिजनों की पापों से मुक्ति के लिए भगवान से प्रार्थना की. इसके बाद ब्राह्मणों को पेड़ के नीचे भोजन करा कर दान-दक्षिणा देकर अक्षय नवमी की कथा का श्रवण किया. इस संबंध में पंडित निशु जी ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार इस व्रत को करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं व मनुष्यों के पापों का अंत होता है तथा उनके घर में सुख शांति का वास होता है.

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