मां दुर्गा व नवरात्र के अनुष्ठान पर परिचर्चा

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 10 Oct 2013 2:24 AM

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मुंगेर: गंगोत्री के तत्वावधान में विशेष परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया गया. उसकी अध्यक्षता डॉ शिवचंद्र प्रताप ने की. वक्ताओं ने मां दुर्गा और नवरात्र के अनुष्ठान के अध्यात्म वैज्ञानिक रहस्य पर प्रकाश डाला. डॉ शिवचंद्र ने कहा कि मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 81 से 93 तक का प्रकरण लोक में दुर्गा सप्तशती के नाम […]

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मुंगेर: गंगोत्री के तत्वावधान में विशेष परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया गया. उसकी अध्यक्षता डॉ शिवचंद्र प्रताप ने की. वक्ताओं ने मां दुर्गा और नवरात्र के अनुष्ठान के अध्यात्म वैज्ञानिक रहस्य पर प्रकाश डाला. डॉ शिवचंद्र ने कहा कि मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 81 से 93 तक का प्रकरण लोक में दुर्गा सप्तशती के नाम से प्रसिद्ध है. दुर्गा सप्तशती के सात सौ ोकों में और उसके चुने हुए सात मंत्रों वाली सपेकी में मूलाधार से सहस्नर तक के सात पड़ावों वाली प्रतिकात्मक अन्तयात्र कथा संगुफित है और इस प्रतीक कथा के दो पहलू है. एक दार्शनिक और दूसरा तांत्रिक एवं प्रायोगिक. इसके दार्शनिक आयाम पर चिंतन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस आख्यान के सूत्रधार मेधाऋषि आत्मा अर्थात अतिमनस से प्रकट होने वाले विवेक यानी ऋतंभरा बुद्धि के प्रतीक है और राजा सुरथ तथा समाधि नाम वैश्य क्रमश: मायाग्रस्त दिग्भ्रमित बुद्धि से उत्पन्न मोह के दो अलग-अलग रूपों के प्रतीक है. एक को लोकैषणा ने ग्रस्त कर रखा है. दूसरे को वित्तेषणा ने. लोकेषणा है यश की भूख और वित्तेषणा है पैसा बटोरने की ललक. हमारा यह युग इन्हीं दो आसुरी वृत्तियों से ग्रस्त है. उन्होंने कहा कि इन आसुरी वृत्तियों का निवास हमारे भीतर है. ये वृत्तियां ही मधु-कैटभ, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज से लेकर महिषासुर तक के रुप धारण कर हमारे शरीर रूपी दुर्ग की अधिष्ठात्री दुर्गा को अच्छादित कर लेना चाहती है. जाहिर सी बात है कि इन पर दुर्गा शक्ति की विजय अर्थात मोह पर विवेक की विजय है. उन्होंने कहा कि दुर्गा सप्तशती के कथा प्रसंगों में निहित इस गूढ़ दर्शन को समझते हुए एकाग्रचित होकर इसके सात सौ ोकों का विधिवत उच्चरणपूर्वक पाठ उसके अक्षरों और वर्णो में संगुम्फित मंत्र शक्ति को जाग्रत और विस्फोटित कर अभीष्ट सिद्ध करा देता है. पर दुर्भाग्यवश हुआ यह है कि औपचारिकताएं रूढ़ होकर रह गयी है और अभि प्रतार्थ काल के प्रवाह में बह गया है. काश दिल्ली और पटना के धर्मनिरपेक्षतावादी सत्तबाज राजा सुरथ और नोट जमा करने वाले समाधि वैश्य समझ पाते दुर्गा शक्ति की अराधना का यह मर्म तो इंडिया कब का भारत हो गया होता और प्राण हो जाता हमारे इस मरनासन्न लोकतंत्र का. मौके पर बुद्धिजीवी व साहित्यकार मौजूद थे.

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