बेणुगढ़ में बैशाखी में लगता है मेला

Published at :09 Apr 2015 8:35 AM (IST)
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बेणुगढ़ में बैशाखी में लगता है मेला

बहादुरगंज: टेढ़गाछ प्रखंड के ऐतिहासिक स्थल राजा बेणुगढ़ में आगामी 15 अप्रैल को एक दिवसीय वैशाखी मेला का आयोजन होगा. इस बाबत स्थानीय ग्रामीण व पूजा कमेटी के सदस्यों का उत्साह बढ़ने लगा है. वे तैयारी में जुट गये हैं. प्रखंड मुख्यालय से 12 किमी तथा जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर प्रखंड के नेपाल […]

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बहादुरगंज: टेढ़गाछ प्रखंड के ऐतिहासिक स्थल राजा बेणुगढ़ में आगामी 15 अप्रैल को एक दिवसीय वैशाखी मेला का आयोजन होगा. इस बाबत स्थानीय ग्रामीण व पूजा कमेटी के सदस्यों का उत्साह बढ़ने लगा है. वे तैयारी में जुट गये हैं. प्रखंड मुख्यालय से 12 किमी तथा जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर प्रखंड के नेपाल की तराई में स्थित राजा बेणु से जुड़ा बेणुगढ़ का पौराणिक इतिहास रहा है.
महाभारत काल में पांडवों के गुप्तवास से भी इस क्षेत्र का नाता रहा है. बेणुगढ़ में आज भी ईंट के टीला एवं मरनावेश राजा बेणु का मंदिर क्षेत्र के लोगों के लिए पूजनीय है. प्रत्येक वर्ष बैशाखी पर्व पर राजा बेणु के मंदिर एवं गढ़ में विराट मेला का आयोजन होता है. जिसमें दोनों संप्रदाय के लोग भारी संख्या में शरीक होते है. राजा बेणु के मंदिर में लोगों की इतनी अटूट आस्था है कि नि:संतान एवं रोगी की मुराद पूरी होने पर कबूतर छागर की बलि एवं मिठाई भेंट करने वाले बैशाखी पर्व पर हजारों की संख्या में पहुंचते है. 180 एकड़ में फैला राजा बेणु का यह टीला आज खंडहर में तब्दील होकर अतिक्रमण का शिकार हो रहा है.
यहां आज भी ऐसी मान्यता है कि गढ़ की रखवाली अदृश्य शक्तियां करती है. गढ़ के पूरब दिशा में विशाल सूखे तालाब की मौजूदगी इन सका आभास कराती है. यहां के लोग बेणु राजा को ग्रामीण देवता के रूप में सदियों से मान्यता देते आये है. यहां से जुड़ी एक और पुरानी मान्यता को लोग आज तक स्मरणीय बनाये हुए है जिसमें गढ़ के अंदर सूखे तालाब के संबंध में मान्यता है कि इस तालाब के किनारे पान सुपारी रखकर पूजन करने से शादी ब्याह एवं अन्य अनुष्ठानों में बरतन की मांग करने पर इस तालाब से कालांतर में पीतल के बरतन की प्राप्ति एक चमत्कार के रूप में होती थी जिसके उपयोग के बाद लोग वापस तालाब को समर्पित करते थे. पुरातत्व विभाग की निगाह से दूर बेणु महाराज की इस धरोहर को आज तारणहार की जरूरत है.
क्षेत्र वासियों का मानना है कि भारतीय पुरातत्व विभाग की पहल पर महाभारत कालीन इस विरासत को अमलीजामा पहना कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की जरूरत है.
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