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हजार वर्ष पूर्व लौह अयस्क से लोहा निकालने का मंजोष में मिला सबूत

Updated at : 21 Jan 2020 7:57 AM (IST)
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हजार वर्ष पूर्व लौह अयस्क से लोहा निकालने का मंजोष में मिला सबूत

सिकंदरा : लखीसराय स्थित लाली पहाड़ी खुदाई दल के निदेशक सह शांतिनिकेतन में पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर अनिल कुमार के नेतृत्व में पुरातत्व विभाग के एक दल ने शनिवार को प्रखंड क्षेत्र स्थित मंजोष गांव में बिखरे पड़े देवी-देवताओं की प्रतिमा व अन्य महत्वपूर्ण स्थलों का निरीक्षण किया. जांच दल में डॉ रजत सान्याल, तन्मय […]

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सिकंदरा : लखीसराय स्थित लाली पहाड़ी खुदाई दल के निदेशक सह शांतिनिकेतन में पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर अनिल कुमार के नेतृत्व में पुरातत्व विभाग के एक दल ने शनिवार को प्रखंड क्षेत्र स्थित मंजोष गांव में बिखरे पड़े देवी-देवताओं की प्रतिमा व अन्य महत्वपूर्ण स्थलों का निरीक्षण किया.

जांच दल में डॉ रजत सान्याल, तन्मय मंडल, राहुल नाग व ईशान हारित शामिल थे. निरीक्षण के दौरान पुरातत्व विभाग की टीम ने मंजोष गांव स्थित लौह अयस्क की पहाड़ी, लौह अयस्क के राख के टीले व महामाया नागेश्वर स्थान के समीप मंदिर में स्थापित व बिखरे पड़े प्राचीन प्रतिमाओं का जायजा लिया. निरीक्षण के क्रम में पुरातत्व वेत्ताओं को पकना टीले के समीप लौह अयस्क से लोहा बनाने के संकेत मिले हैं.
उल्लेखनीय है कि मंजोष गांव में बड़ी मात्रा में लौह अयस्क का भंडार होने की संभावना भूतत्व विभाग के द्वारा जताई जा रही है. मंजोष स्थित लौह अयस्क की पहाड़ी से तकरीबन आधे किलोमीटर की दूरी पर पकना टीला है. जो लौह अयस्क को गला कर लोहा निकालने के बाद बचे अवशेष की राख का अंश प्रतीत होता है.
लौह अयस्क से लोहा निकालने का बिहार में यह पहला मामला
प्रोफेसर अनिल कुमार ने बताया कि हजार साल पूर्व मंजोष गांव में लोह अयस्क से लोहा निकालने का यह बिहार का पहला मामला सामने आया है. निरीक्षण के दौरान पुरातत्व विभाग की टीम को पकना टीला के समीप से लौह अयस्क से निर्मित लोहे का टुकड़ा भी प्राप्त हुआ है.
जिसे एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना माना जा रहा है. वहीं पकना टीला व आसपास के क्षेत्रों से 8वीं से 10वीं सदी के ईंट व मिट्टी के बर्तन के टुकड़े भी प्राप्त हुए हैं. इस दौरान पुरातत्व विभाग की टीम ने महामाया नागेश्वर स्थान के समीप स्थित मंदिर में स्थापित व मंदिर के बाहर बिखरे पड़े खंडित प्रतिमाओं का भी जायजा लिया.
इस दौरान भगवान विष्णु, महिषासुर मर्दिनी समेत अनेक देवी देवताओं के साथ ही भूमि स्पर्श मुद्रा में विराजमान भगवान बुद्ध की प्रतिमा को चिह्नित किया गया. प्रतिमाओं के निरीक्षण के दौरान पुरातत्व विभाग के सदस्यों ने प्रतिमा पर अंकित गौरी लिपि में लिखे शब्दों को पढ़ने का प्रयास किया. इस दौरान पुरातत्व वेत्ताओं ने इस क्षेत्र को महात्मा बुद्ध से जुड़े होने की भी संभावना जतायी.
इस क्षेत्र में गहन अध्ययन की आवश्यकता : टीम
पुरातत्व विभाग की टीम ने वृहत अध्ययन के लिये मूर्तियों के फोटोग्राफ व टूटे टुकड़े को भी साथ ले गए. इस दौरान ग्रामीण अरविंद कुमार भारती, रामनरेश सिंह, रंजीत सिंह आदि ने बताया कि कुछ प्रतिमाओं को मंदिरों में रखकर सहेजा गया है. जबकि दर्जनों की संख्या में खंडित प्रतिमाएं मंदिर के बाहर पड़ी हैं. वहीं कुछ महत्वपूर्ण प्रतिमाओं की चोरी भी हो चुकी है.
ग्रामीणों ने बताया कि मंदिर के आसपास आज भी खुदाई के दौरान प्रतिमा मिल जाती है. निरीक्षण के उपरांत पुरातत्व विभाग के सदस्यों ने बताया कि इस क्षेत्र की गहन जांच करने की आवश्यकता है. उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र भी लाली पहाड़ी व इंदपे गढ़ से कम महत्वपूर्ण नहीं है. उन्होंने बताया कि जल्द ही सरकार को रिपोर्ट सौंप कर इस क्षेत्र के विस्तृत सर्वे की मांग की जायेगी.
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