...घर की बिखरी हुई चीजों को सजा दी मैंने
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :04 Jan 2017 12:12 AM (IST)
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दुलदुलिया में कवि सम्मेलन आयोजित कवि सम्मेलन सह मुशायरे में ठंडी रात में साहित्य की गंगा में लोग डुबकी लगाते रहे गोपालगंज : इक शमा प्यार की दिल में जला दी मैंने, आग उसने जो लगायी थी बुझा दी मैंने, किसकी हालत थी कल हालते मदहोशी में, घर की बिखरी हुई चीजों को सजा दी […]
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दुलदुलिया में कवि सम्मेलन आयोजित
कवि सम्मेलन सह मुशायरे में ठंडी रात में साहित्य की गंगा में लोग डुबकी लगाते रहे
गोपालगंज : इक शमा प्यार की दिल में जला दी मैंने, आग उसने जो लगायी थी बुझा दी मैंने, किसकी हालत थी कल हालते मदहोशी में, घर की बिखरी हुई चीजों को सजा दी मैंने. मेराजुद्दीन तिश्ना की रचना ने सबको झोर दिया. मांझा प्रखंड के दुलदुलिया गांव में आयोजित कवि सम्मेलन सह मुशायरे में ठंडी रात में साहित्य की गंगा में लोग डुबकी लगाते रहे. जैसे-जैसे रात बढ़ने लगी, वैसे-वैसे दर्शक भी आनंद में डूबे रहे. रजी अहमद फैजी की रचना कोई भी हुस्न यहां ला जवाब थोड़ी है, मेरे हबीब की कोई मिसाल थोड़ी है,
बुंलदियों पे ठहरना मुहाल होता है, बुलदियों पे पहुंचना मुहाल थोड़ी है, को लोगों ने जम कर सराहा. वहीं, शर्फुद्दीन की रचना मंजिल का पता कोई भी नहीं है, थक-हार के बैठा कहीं जाता भी नहीं है, इक आग का दरिया है खां सीने के अंदर, बुझता भी नहीं साफ जलाता भी नहीं है.
गुलाम सरवर हासमी ने पढ़ा कि फिकरों अदब से लफ्जों का तेवर समेट लो, अपनी गजल में शेर भी बेहतर समेट लो, कुछ भी न साथ जायेगा अमाल के सिवा, तुम खाहिशों की अपनी ओ चादर समेट लो. मुशायरा कन्वेनर मेराजुद्दीन तिश्ना और दिलशाद मदनी के सहयोग से कराया गया. मुशायरे की अध्यक्षता मास्टर सतार ने की, जबकि नेजामत शर्फुद्दीन शर्फ ने की.
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