खतरे में यात्री, मौज में अधिकारी

Published at :21 Sep 2016 3:21 AM (IST)
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खतरे में यात्री, मौज में अधिकारी

खिलवाड़ सड़कों पर सरपट दौड़ रहीं मौत बन कर बसें, मधुबनी की तरह किसी बड़े हादसे का इंतजार गोपालगंज : यहां की व्यवस्था आपको चौका देगी. बसें जर्जर हैं. यात्रियों को ऊपर छत से लेकर नीचे तक भरने के बाद ही आगे बढ़ती है. रास्ते में यात्री हाथ दे तो रोक कर उसे भी बैठा […]

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खिलवाड़ सड़कों पर सरपट दौड़ रहीं मौत बन कर बसें, मधुबनी की तरह किसी बड़े हादसे का इंतजार

गोपालगंज : यहां की व्यवस्था आपको चौका देगी. बसें जर्जर हैं. यात्रियों को ऊपर छत से लेकर नीचे तक भरने के बाद ही आगे बढ़ती है. रास्ते में यात्री हाथ दे तो रोक कर उसे भी बैठा लिया जाता है. यानी 52 सीटों वाली बसों में 80-90 यात्रियों को बैठा कर फर्राटा भरा जा रहा है. यानी पल-पल यात्रियों के सिर पर यहां मौत मंडरा रही है. शायद परिवहन विभाग को बड़े हादसे का इंतजार है. सड़क पर दौड़नेवाली बसों की जांच तक करने की फुरसत विभाग के पास नहीं है. कागजात की जांच नहीं होने से बसें बेखौफ होकर सड़कों पर दौड़ रही हैं. पिछले एक दशक में आज तक बसों की जांच के लिए अभियान कभी नहीं चलाया गया.
इसके कारण बसों के पास न तो कागजात है और न ही परमिट है. बिना टैक्स दिये बसों को चलाया जा रहा है. इसके लिए विभाग में इनकी जबरदस्त सेटिंग है. विभाग तक पहुंच की बदौलत यहां बसों का परिचालन हो रहा है. इनको हादसे की कोई परवाह नहीं है. यात्रियों की जान से भी इनको कोई मतलब नहीं है. शायद हादसे के बाद विभाग की नींद खुले. वैसे अधिकारियों को बलथरी बैरियर से ही फुरसत नहीं है. यात्रियों को लेकर चलनेवाली 208 बसों के पास परमिट नहीं है. न तो बसों की टाइमिंग तय है. ये बसें रोज विभिन्न सड़कों पर यात्रियों को लेकर चल रही है. बसें जर्जर हैं. यात्री अगर संभल कर नहीं बैठे तो उनके कपड़ें भी फट जाते हैं. ये बसें कब कहां धोखा दे दे कहना मुश्किल है. बसों के मालिक दबंगई की बदौलत उनको चला रहे हैं.
राजेंद्र नगर बस स्टैंड में छत पर बैठ कर यात्रा करते यात्री.
जिले में बसों की संख्या बड़ी बस – 361
मिनी बस- 501
बसों के लिए जरूरी है कागजात
बस का ऑनरबुक
विभाग द्वारा जारी टैक्स टोकन
बसों की सीट के अनुरूप इंश्योरेंस
बस का फिटनेस प्रमाणपत्र
प्रदूषण नियंत्रण का प्रमाणपत्र
महज जांच की खानापूर्ति
मधुबनी हादसे के बाद भी परिवहन विभाग खामोश बना हुआ है. वाहनों की जांच के प्रति कोई कार्रवाई की योजना भी नहीं है. बसों की जांच फिटनेस प्रमाणपत्र एमवीआइ को देना होता है. साल में जब बसों के फिटनेस की जांच की बारी आती है, तो विभाग के बाबू या माफिया टैक्स जमा कर एमवीआइ के पास पहुंचते हैं. बिना बसों की जांच के ही कागज में फिटनेस रिपोर्ट दे दी जाती है.
इस संबंध में एमवीआइ दिव्य प्रकाश ने बताया कि छह माह में चार-पांच बसों की जांच की गयी.
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