(फ्लायर)मदरसा के छात्रों में अंगरेजी सीखने की होड़, मोबाइल एप का सहारा

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(फ्लायर)मदरसा के छात्रों में अंगरेजी सीखने की होड़, मोबाइल एप का सहारा विदेश में नौकरी के लिए उर्दू की डिग्री रखनेवाले भी अंगरेजी सीखने पर दे रहे जोरसंवाददाता, गोपालगंजउर्दू अदब की भाषा मानी जाती है. इसकी खासियत है नजाकत. लफ्ज भले ही समझ में न आयें, सुनने में अच्छे जरूर लगते हैं. हालांकि, रोजगार की […]

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(फ्लायर)मदरसा के छात्रों में अंगरेजी सीखने की होड़, मोबाइल एप का सहारा विदेश में नौकरी के लिए उर्दू की डिग्री रखनेवाले भी अंगरेजी सीखने पर दे रहे जोरसंवाददाता, गोपालगंजउर्दू अदब की भाषा मानी जाती है. इसकी खासियत है नजाकत. लफ्ज भले ही समझ में न आयें, सुनने में अच्छे जरूर लगते हैं. हालांकि, रोजगार की जरूरतों को लेकर उर्दू पर अंगरेजी हावी होती जा रही है. जिले के मुस्लिम बहुल इलाके में बीते कुछ वर्षों में अंगरेजी की पूछ बढ़ी है. नौजवान अंगरेजी बोलने-सीखने के लिये स्पोकेन इंगलिश क्लासेज में जा रहे हैं. इसके पीछे मंशा विदेश में रोजगार पाना है, जिसके लिये अंगरेजी की अधिक जरूरत है. सोच है कि अंगरेजी सीखने के बाद कही न कहीं तो नौकरी मिल ही जायेगी. चाहे देश हो या विदेश. बरौली के सरेया में युवाओं के कई समूह हैं, जो विदेश में रोजगार तलाशने की जुगत कर रहे हैं. ये लोग आपस में अंगरेजी में ही बात करते हैं, ताकि बोलचाल में इसकी व्यवहारिकता बनी रहे. इनमें अधिकांश छात्र मदरसा से डिग्री ले चुके हैं. उनका मानना है कि मुकाम तक पहुंचने में उर्दू की डिग्री के साथ ही अंगरेजी पर कमांड का बहुत फायदा मिलेगा.एक लाख लोग विदेशों में कमाते हैं रोजी-रोटीजिले के करीब एक लाख लोग खाड़ी देशों में नौकरी कर रहे हैं. उनके बारे में जान-सुन कर इन युवाओं के मन में भी विदेश जाकर कमाने की इच्छा बलवती होती जा रही है. मन में वहां जाने की इच्छा पाले ऐसे युवा पासपोर्ट आदि बना कर अंगरेजी सीखने में लगे हैं.मांझा निवासी मो. दिलशाद आलम ने मदरसा से मौलवी तक की पढ़ायी की है. अब अंगरेजी सीख रहे हैं. दिलशाद को मलेशिया या अन्य देश में नौकरी के लिये जाना है. इस वजह से दोस्तों के साथ मिल कर अंगरेजी सीखने का प्रयास कर रहा है. उसके लगभग एक दर्जन दोस्त हैं, जो मानते हैं कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अंगरेजी जानना जरूरी है. ताकि विदेश जाने पर भाषा की परेशानी नहीं हो. दिलशाद के दोस्त अंगरेजी के लिये मोबाइल एप व किताबों का सहारा ले रहे है.खुल गये कई संस्थान युवाओं में बढ़ती दिलचस्पी देख अंगरेजी सिखाने के नाम पर शहर ही नहीं वलिक बरौली,मांझा,सरेया,विशुनपुर सहित आसपास के इलाके में कई इंग्लिश स्पोकेन क्लास चल रहा है. यहां सामान्य स्कूली छात्रों के अलावा विदेश में रोजगार पाने की चाहत रखने वाले युवक भी अंगरेजी सीख रहे है. ऐसे कोंचिंग संस्थान चलाने वाले इरफान का कहना है कि पहले इस क्षेत्र में अंगरेजी का आकर्षण नहीं था लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह बढ़ा है. इसका प्रमुख कारण विदेश में रोजगार की चाह और उसके लिये अंगरेजी का जरुरत.

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