सीनेट की मंजूरी मिली फिर भी एडमिशन नहीं

Updated at :02 Jul 2016 8:05 AM
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सीनेट की मंजूरी मिली फिर भी एडमिशन नहीं

गया:जगजीवन कॉलेज एमए की पढ़ाई कराने के लिए उच्च शिक्षा विभाग की कृपा दृष्टि के इंतजार में है. सीनेट की ओर से काॅलेज को हरी झंडी दिये जाने के बाद भी मामला लटका है. इसका नतीजा है कि स्नातक के बाद स्टूडेंट्स को आगे की पढ़ाई के लिए बाहर जाना पड़ रहा है. जगजीवन काॅलेज […]

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गया:जगजीवन कॉलेज एमए की पढ़ाई कराने के लिए उच्च शिक्षा विभाग की कृपा दृष्टि के इंतजार में है. सीनेट की ओर से काॅलेज को हरी झंडी दिये जाने के बाद भी मामला लटका है. इसका नतीजा है कि स्नातक के बाद स्टूडेंट्स को आगे की पढ़ाई के लिए बाहर जाना पड़ रहा है.
जगजीवन काॅलेज के पास अपनी विशाल बिल्डिंग के साथ करीब 11 एकड़ से अधिक भूमि है. यहां इंटर से लेकर बीए तक की पढ़ाई होती है. विभिन्न विषयों में नियमित शिक्षकों की उपस्थिति भी बहुत हद तक संतोषजनक है. यही वजह है कि यहां स्टूडेंट्स नियमित डिग्री पूरा कर लेना चाहते हैं. दूसरी सबसे बड़ी वजह यह भी है कि जगजीवन कॉलेज बहुत बड़े ग्रामीण क्षेत्र को कवर करता है.
काॅलेज के शिक्षकों का कहना है कि यहां से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित गांवों के छात्र पढ़ने आते हैं. इसकी वजह काॅलेज का गांव के मुख्य पहुंच मार्ग पर स्थित होना है, जहां से छात्रों व उनके अभिभावकों को कभी भी व किसी भी समय पर आने-जाने की सुविधा होती है. साथ ही, छात्रों को काॅलेज के पास ही ठहरने के लिए आसानी से किराये पर कमरा भी मिल जाता है. इतनी मूलभूत सुविधा के बावजूद काॅलेज को बीते पांच दशक से अब तक एमए की पढ़ाई के लिए सरकार से अनुमति नहीं मिली है.
उच्च शिक्षा विभाग में दो वर्षों से धूल फांक रही अनुमोदन की फाइल
विश्वविद्यालय की ओर से एमए में भूगोल व मनोविज्ञान के लिए 30-30 सीट अनुमोदित की गयी हैं. पर, अब तक उच्च शिक्षा विभाग की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है. अनुमोदन की फाइल बीते दो वर्षों से उच्च शिक्षा विभाग में धूल फांक रही है. काॅलेज प्रबंधन का कहना है कि हर साल 420 छात्र-छात्राएं स्नातक पास करते हैं. इसमें से आधे से अधिक विद्यार्थी संबंधित काॅलेज से ही आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं, पर काॅलेज चाह कर भी उनका साथ नहीं दे पाता है. ऐसे में वे या तो पढ़ाई छोड़ देते हैं, या फिर किसी दूसरे काॅलेज में चले जाते हैं.
2013 में िदया गया था आदेश
काॅलेज प्रशासन का कहना है कि काॅलेज की स्थापना 1959 में हुई थी. 2013 के जुलाई महीने में विश्वविद्यालय की टीम ने एमए मनोविज्ञान व भूगोल में पठन-पाठन के लिए कॉलेज के इन्फ्रास्ट्रक्चर की जांच की थी. साथ ही, स्नाकोत्तर की शिक्षा प्रारंभ करने का आदेश जारी किया था. लेकिन, नामांकन की प्रक्रिया अब तक नहीं शुरू हो सकी. इसके बाद वर्ष 2014 में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा पाठ्यक्रम की अनुमति के लिए उच्च शिक्षा विभाग को पत्र भेज दिया गया.
लगातार किया जा रहा पत्राचार
हर साल बड़ी संख्या में काॅलेज के छात्र एमए मनोविज्ञान व भूगोल में स्नातकोत्तर में नामांकन के लिए आते हैं, लेकिन अनुमति नहीं होने की वजह से छात्रों का एडमिशन नहीं लिया जा सकता है. अनुमति के लिए विश्वविद्यालय व उच्च शिक्षा विभाग से लगातार पत्राचार किया जा रहा है, पर शिक्षा विभाग की ओर से इस मसले पर अब तक कोई जवाब नहीं आया है. उन्होंने बताया कि काॅलेज के पास मनोविज्ञान विषय में तीन व भूगोल में भी तीन शिक्षक हैं. उन्हें अलग से शिक्षक की फिलहाल कोई आवश्यकता नहीं है. बावजूद इसके विभाग की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की गयी है.
डाॅ सुनील सिंह सुमन, प्रिंसिपल, जेजे काॅलेज
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