मिथिलांचल की सद्धिपीठ मां वाणेश्वरी

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मिथिलांचल की सिद्धपीठ मां वाणेश्वरी मां के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटताफोटो संख्या : 1परिचय:दरभंगा. तंत्र साधना के लिए मिथिला की धरती प्राचीनकाल से ही सुविख्यात रही है. यहां शक्ति के साधकों की कमी नहीं है. तभी तो शक्तिस्वरुप भगवती का प्रसिद्ध मंदिर यहां जगह-जगह पाये जाते हैं. इसमें दरभंगा जिला के मनीगाछी […]

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मिथिलांचल की सिद्धपीठ मां वाणेश्वरी मां के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटताफोटो संख्या : 1परिचय:दरभंगा. तंत्र साधना के लिए मिथिला की धरती प्राचीनकाल से ही सुविख्यात रही है. यहां शक्ति के साधकों की कमी नहीं है. तभी तो शक्तिस्वरुप भगवती का प्रसिद्ध मंदिर यहां जगह-जगह पाये जाते हैं. इसमें दरभंगा जिला के मनीगाछी प्रखंड के मकरन्दा गांव स्थित वाणेश्वरी भगवती प्रसिद्ध शक्तिपीठ है. मान्यता है कि सच्चे मन से जो भी इनके दर पर माथा टेकता है,खाली नहीं लौटता . भगवती का भव्य मंदिर सामान्य सतह से लगभग सात से दस फीट ऊंचा, जिसे लोग ‘डीह’ कहते है,पर अवस्थित है.यहां पहुंचने पर ही किसी ऐतिहासिक धरोहर होने का एहसास स्वत: होने लगता है. कुछ विद्वन इसे कर्नाट वंशीय शसकों के प्रशासकीय स्थल की बात बताते हैं, जबकि कुछ राजा शिव सिंह के गढ़ से इस स्थल का संबंध मानते हैं. इसके पीछे तर्क यह है कि इस डीह से दक्षिण ‘घोरदौर’ तालाब और इसके बगल में गढ़ियारी गांव इस बात को प्रमाणित करने के लिए काफी है कि यहां किसी राजा का गढ़ रहा हो. कारण जो भी हो पर इतना तो स्पष्ट है कि पाल कालीन देवी वाणेश्वरी की अप्रतिम मूर्ति स्वत: इसकी प्राचीनता का बोध कराता है.मां वाणेश्वरी के प्रादुर्भावा के संबंध में स्थानीय लोग कई बातें बताते है. कहा जाता है कि कालिक पुजारी मुगल काल में औरंगजेब बादशाह के शासन के दरम्यान शासन वर्ग के दुराचार एवं अत्याचार से मर्माहत कवि बाण झा की अति सुन्दरी पुत्री वाणेश्वरी के प्रतिरोधात्मक स्वाभाव से जोड़कर प्रस्तर रूप में परिणत होने को कहते है. वहीं कुछ लोग मुगल कालीन शासन के अन्तर्गत वाणभट्ट नामक हिन्दू शोर्य पुरुष की सुपुत्री के रूप में वाणेश्वरी के जन्म लेने व मुसलमान शासक द्वारा इनके रूप गुण की चर्चा सुनकर बलपूर्वक उठा लने के क्रम में इन्हें प्रस्तर रूप के धारण कर लेने के तथ्य को कहते हैं. मंदिर से सटे पूरब एक तालाब से देवी वाणेश्वरी की मूर्ति का निकलना तो ठोस सत्य है. जिसे ग्रामीण ने इसी डीह पर एक पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू किया. जो भी हो पर इतना तो सत्य है कि कई भक्तों को इच्छा के अनुरुप फल की प्राप्ति हुई. प्रमाणस्वरुप मंदिर का महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह की पत्नी महारानी लक्ष्मीवती ने इस देवी की पूजा अर्चना कर अपने भाई श्री नाथ मिश्र के पुत्र होने की याचना कर मंदिर निर्माण करवाने की मंशा रखी. महारानी की इच्छा देवी ने पूरी की. इससे आह्लादित होकर महारानी ने सन् 1872 ई0 में वाणेश्वरी के वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया जो अपने आप में एक उत्कृष्ट कला है.इतिहास के जानकार बताते हैं कि मंदिर में स्थापित भगवती समेत परिसर में रखे काले पत्थर की मूर्ति अपने में अनेक तथ्यों को समेटे है. पुरातत्विक महत्व की दृष्टि से इस स्थल का विशेष योगदान संभव है. मूर्तियों की बनावट व पत्थर की पहचान से काल निर्धारण भी संभव है. इतना ही नहीं इस स्थल के गर्भ में अनेक ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं भी छिपी है. कई बार हल जोतने व मिट्टी कटाई के क्रम में चितीकौरी से भरा विशाल कालामटका सहित अनेक ऐसी वस्तुएंं मिली है जो हजारों वर्ष के इतिहास को दर्शाता है. इतने महत्व की यह ऐतिहासिक व आध्यात्मिक स्थल सरकार की दृष्टि से ओझल है. जानकारों का मानना है कि यदि इस स्थल की खुदाई करवाया जाय तो कई ऐतिहासिक तथ्य सामने आ जायेंगे. इस स्थल के समुचित विकास की ओर कोई राजनितिक व्यक्ति भी अभिरुचि नहीं लिये. इस गांव के लोगों ने इस स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का जरूर प्रयास किया है. ग्रामीण डा. राम मोहन के नेतृत्व में वाणेश्वरी हाल्ट निर्माण के लिए प्रयास किया गया. बताया जाता है कि इस दिशा में आवश्यक कार्रवाई प्रारंभ है पर सच्चाई तो अभी भविष्य के गर्भ में है.

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