जल संरक्षण का संदेश देने वाली मिथिला में बूंद-बूंद पानी की तलाश
Updated at : 21 May 2019 2:46 AM (IST)
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दरभंगा : विरासत में मिली धरोहर आज उपेक्षा का शिकार है. तालाबों के शहर में पानी के लिए हाहाकार मचा है. प्यास बुझाने के लिए बूंद-बूंद पानी की तलाश हो रही है. पूरे जिला का लेयर डाउन हो गया है. चापाकल से पानी आना बंद हो गया है. मोटर युक्त चापाकल से पानी निकालने के […]
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दरभंगा : विरासत में मिली धरोहर आज उपेक्षा का शिकार है. तालाबों के शहर में पानी के लिए हाहाकार मचा है. प्यास बुझाने के लिए बूंद-बूंद पानी की तलाश हो रही है. पूरे जिला का लेयर डाउन हो गया है. चापाकल से पानी आना बंद हो गया है. मोटर युक्त चापाकल से पानी निकालने के लिए लोग रतजगा कर असफल प्रयास कर रहे हैं. जल संकट के निदान के लिए प्रशासन से लेकर आमजन चिंतित हैं. विकास की गति में नदी के साथ जीने की परंपरा दम तोड़ती जा रही है.
देखरेख व संरक्षण के अभाव में तालाब का अस्तित्व मिटता जा रहा है, जो बचे हैं, उसकी दशा चिंताजनक है. तालाब की संख्या के साथ पानी लगातार घटता जा रहा है. शुद्ध पेयजल के रूप में कुएं का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. वह भी समय की मार झेलते विलुप्त सा होता जा रहा है. कुआं किसी जमाने में दरवाजे की शान हुआ करती थी. वर्त्तमान में आपदा के रूप में बदले पेयजल संकट ने तालाबों के मिटते वजूद व अतिक्रमण को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. उल्लेखनीय है कि इन दिनों विशेषकर शहरी क्षेत्र में जलसंकट चरम पर पहुंच गया है. चापाकल सूख गये हैं.
नल का पानी मिल नहीं रहा. समरसेबुल गड़वाना सभी के लिए सहज संभव नहीं है.
इतिहास बताता है, दरभंगा राज के महाराज नरेंद्र सिंह ने न सिर्फ मिथिला बल्कि पूरे देश दुनिया को जल संरक्षण का संदेश दिया था. अकाल पड़ने के बाद मिथिलांचल को बचाने के लिए नदी के अतिरिक्त जल को तालाब में संचय करने पर बल दिया.
राजा नरेंद्र सिंह के संदर्भ में कहा जाता है कि उन्होंने नदी को बांधने के बजाय पूरे मिथिलांचल में लाखों तालाबों का निर्माण कर नदी के अतिरिक्त जल का संचय किया. नहर, तालाब व कुएं का निर्माण कर सिंचाई प्रणाली को विकसित किया. जल संचय वाली भूमि (चौर) में मछली पालन व धान की उपज साथ करने की समझ विकसित की. वर्तमान में सरकार जल संरक्षण को लेकर प्रचार तीव्र गति से कर रही है.
इसमें कितनी सफलता मिली या नहीं मिली यह आंकने का कोई पैमाना नहीं है. जल संरक्षण को लेकर मनरेगा, नरेगा सहित कई योजनाओं से इसे मूर्त रूप देने का प्रयास किया जा रहा है. परंतु हकीकत यह है कि करोड़ों रुपये बहाये गया, बावजूद अधिकांश जल संरक्षण स्थल बेकार पड़े हैं. दूसरी तरफ पूंजीपति व भू-माफिया जल संरक्षण वाले नहर, पोखर, डबरा, कुआं आदि का अस्तित्व मिटा दिया. शेष बचे जल संरक्षण स्थानों पर भी इनकी नजर है.
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