बाढ़-सुखाड़ प्रभावित क्षेत्रों में किसानी होगी आसान

Published at :29 Aug 2016 7:32 AM (IST)
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बाढ़-सुखाड़ प्रभावित क्षेत्रों में किसानी होगी आसान

सेमिनार ईरास तकनीक अपना किसान 25 से 30 फीसदी बढ़ा सकते हैं उपज अनुशंसित धान की प्रजाति एवं प्रबंधनक विधि से किसानों को मिलेगा 103 फीसदी उपज में लाभ बेतिया : मौसम के बेरुखी से किसान त्रस्त है. अगस्त माह में औसत से कम बारिश होने से जहां फसले सुख रही है वहीं बाढ़ व […]

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सेमिनार

ईरास तकनीक अपना किसान 25 से 30 फीसदी बढ़ा सकते हैं उपज
अनुशंसित धान की प्रजाति एवं प्रबंधनक विधि से किसानों को मिलेगा 103 फीसदी उपज में लाभ
बेतिया : मौसम के बेरुखी से किसान त्रस्त है. अगस्त माह में औसत से कम बारिश होने से जहां फसले सुख रही है वहीं बाढ़ व जलजमाव से धान की फसलें नष्ट हो रही है. किसानों को बाढ़ व सुखाड़ प्रभावित क्षेत्रो में उन्नत तकनीक का सहारा लेनी होगी.
रविवार को किसानों को सेमिनार में चावल अनुसंधान संस्थान फिलीपिंस के कृषि विशेषज्ञ डा़ वीरेन्द्र यादव ने कही.
उन्होंने इन क्षेत्रो में ईरास परियोजना द्वारा कराये जा रहे सबर्णा सब- वन धान के बारिकियों की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि बिल एण्ड मेलिंडा गेट्स फाउण्डेशन द्वारा वितपोषित ईरास परियोजना अंतर्गत सहयोगी संस्थानो ने बिहार के बाढ़ एवं सुखाग्रस्त क्षेत्रो के लिए वर्षा आधारित खेती की उन्नत खेती की उन्नत तकनीकें विकसित की है.
इनके अंतर्गत धान गेहूं चना और मसूर की नयी प्रजातियों की अनुशंसा एवं अनुशंसित प्रबंधन विधि सम्मिलित है. उन्होंने बताया कि बिहार के सीमांत एवं छोटे किसानों के लिए प्रासंगिक तकनीक को विभिन्न स्तरो पर विकसित किया गया है. पहले चरण में आईसीएआर पटना और राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा एवं बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर द्वारा कृषि
अनुसंधान किया जाता है. दूसरे चरण में कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा ऑन फार्म ट्रायल लगाकर तकनीको का परीक्षण किया जाता है.
तीसरे चरण में गांवो में किसानों के खेतों में प्रदर्शन स्थानीय संस्थानों लगाया जाता है. कार्यक्रम समन्वयक अजीत सिंह ने बताया कि ईरास परियोजना के तहत बिहार के दो बाढ़ प्रभावित जिले जैसे प़चम्पारण एवं सीतामढ़ी तथा दो सुखा प्रभावित जिले औरंगाबाद एवं गया के गांवो में किसानों के खेतो पर उन्नत कृषि तकनीको का प्रर्दशन विगत चार वर्षों से किया जा रहा है. परियोजना प्रबंधक अनिल लुकस ने बताया कि इस परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान बेहतर परिणाम सामने आये है. बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रो के लिए स्वर्णा सबवन धान की प्रजाति की खेती की
गयी जो 14से 17 दिन तक बाढ़ के पानी मे डुबकर भी अच्छी उपज प्रदान करती है. बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रो में किसान की प्रचलित प्रजाति एवं प्रबंधन तकनीक की तुलना में परियोजना द्वारा अनुशंसित धान की प्रजाति एवं प्रबंधन विधि से किसानों की उपज में 103 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसीप्रकार रबी फसलों में अनुशंसित मसूर चना एवं गेहूं में 86,80 व 24 प्रतिशत की वृद्धि पायी गयी. परियोजना द्वारा अनुशंसित खरपतवार नाशियों के प्रयोग से किसानों की
खेती में शुद्ध लाभ 26 से 50 प्रतिशत तक बढ़ा. कार्यक्रम में उपस्थित किसानों ने भी ईरास द्वारा अनुशंसित तकनीक के आधार किये गये खेती एवं उससे हुए लाभ की जानकारी दी. मौके पर फादर पास्कल आनंद, फादर पॉल आदि भी उपस्थित थे.
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