जहन्नुम की आग से निजात को इस अशरे में करें इबादत

बेतिया : यूं तो रमजान का पूरा महीना ही रहमतों का महीना है. लेकिन सबसे अहम इसमें 21 वें से 30 वें रोजे तक चलने वाला तीसरा अशरा है. वह इसलिए क्योंकि इसी अशरे की ताक रातों में यानी 21, 23, 25, 27 व 29 रमजान की रात पाक कुरआन शरीफ नाजिल हुई थी. इन […]
बेतिया : यूं तो रमजान का पूरा महीना ही रहमतों का महीना है. लेकिन सबसे अहम इसमें 21 वें से 30 वें रोजे तक चलने वाला तीसरा अशरा है. वह इसलिए क्योंकि इसी अशरे की ताक रातों में यानी 21, 23, 25, 27 व 29 रमजान की रात पाक कुरआन शरीफ नाजिल हुई थी. इन रातों में से जिस रात को कुरआन शरीफ नाजिल हुई, उसे शबे कद्र की रात कहते हैं. इसलिए इन रातों की अहमियत काफी बढ़ जाती है. मौलानाओं की माने तो इस अशरे खासकर शबे क्रद की रात में अल्लाह की इबादत करने से जहन्नुम की आग से निजात मिलती है. मौलाना मुर्तुजा अंसारी ने बताया कि शबे कद्र की रात को हजार महीने की रातों के बराबर बताया गया है.
लेकिन वह कौन सी रात है, किस रात को कुरआन शरीफ नाजिल हुई, यह ठीक-ठीक मालूम नहीं है. इसलिए रोजेदार इन पांचों रात को जागकर खुदावंद करीम की इबादत करते हैं. उन्होंने बताया कि रमजान माह को तीन अशरे में बांटा गया है. पहला अशरा रहमत का है. इस अशरे में अल्लाह तआला अपने रहमत से अपने बंदों को नवाजता है. दूसरा अशरा मगफिरत का है यानी रब्बुल आलमीन से अपने गुनाहों की माफी मांगने का. इस अशरे में अल्लाह का कोई भी बंदा अगर दिल से अपने गुनाहों की माफी मांगता है, तो रब्बुल आलमीन उसे माफ कर देता है. तीसरा अशरा निजात का है. इस अशरे में खुदा की इबादत करने वालों को जहन्नुम की आग से मुक्ति मिलती है. तीसरा अशरा 21 वें रोजे यानि मंगलवार से शुरू हो गया है और यह 30वें रोजे तक रहेगा. इसके साथ ही इस अशरे में अलविदा की जुमा भी पड़ती है.
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