बजट 90 करोड़ का दवा निजी दुकान से

Updated at : 06 Sep 2017 4:51 AM (IST)
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बजट 90 करोड़ का दवा निजी दुकान से

मोतिहारी : शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई का नारा लिखा बोर्ड भले ही चौक-चौराहों पर दिखता है. तीन में एक यानि स्वास्थ्य के लिए पूर्वी चंपारण का सालाना बजट करीब 90 करोड़ का बनता है, लेकिन दवा निजी दुकान से खरीदनी पड़ती है. कुछ राशि जागरूकता के अभाव में लौट जाती है, तो कुछ की खानापूर्ति तक […]

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मोतिहारी : शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई का नारा लिखा बोर्ड भले ही चौक-चौराहों पर दिखता है. तीन में एक यानि स्वास्थ्य के लिए पूर्वी चंपारण का सालाना बजट करीब 90 करोड़ का बनता है, लेकिन दवा निजी दुकान से खरीदनी पड़ती है.

कुछ राशि जागरूकता के अभाव में लौट जाती है, तो कुछ की खानापूर्ति तक सीमित है. मुफ्त दवा, मुफ्त ऑपरेशन, कपड़ा, धुलाई, अल्ट्रासाउंड व अन्य जांच का जो भी दावा हो, लेकिन हकीकत छोटा अस्पताल हो या बड़ा जांच में सामने आ जायेगा. पड़ताल के बाद एक नजर सरकारी योजनाओं पर डालते हैं कि हकीकत क्या है?
प्रत्येक गांव के लिए 10 हजार रुपये : गांव स्तर पर जागरूकता और स्वच्छता अभियान के लिए ग्रामीण स्वच्छता समिति को विभाग से 10 हजार रुपये आवंटित किया जाता है. यह राशि वार्ड पार्षद व एएनएम के नाम होती है. क्योंकि पार्षद अध्यक्ष और एएनएम सचिव होते हैं.
बजट 90 करोड़
जानकार बताते हैं कि उक्त राशि या तो खर्च नहीं हो पाती या कागजी खानापूर्ति की जा रही है. कहीं स्वच्छता समिति का गठन व कार्यरूप नहीं है. इस कारण प्रसव के बाद सरकारी सहायता राशि से महिलाएं वंचित रह जाती हैं.
सुरक्षित मातृत्व अभियान
गर्भ के दौरान महिला का चार बार खून, वजन आदि की जांच करनी है. जांच के बाद 360 कैल्शियम और 360 आयरन की गोलियां देनी हैं. कहीं-कहीं जांच तो होती है, लेकिन दवा नहीं दी जाती. मजबूरन बाजार से दवा लेनी पड़ती है. यही नहीं नाॅर्मल प्रसव के दौरान दवा के लिए 600 रुपये का प्रावधान है, जो विभागीय पेंच के कारण नहीं दिया जाता है. ऐसे में मरीज को पर्ची थमा दी जाती है.
इन्हें देनी है फ्री एंबुलेंस सेवा
गर्भवती मां को घर से लाने व नवजात के साथ फिर घर पहुंचाने तक, दुर्घटना के शिकार व्यक्ति को, नवजात बीमार बच्चे को, कालाजार रोगी को, सीनियर सिटीजन को मुफ्त एंबुलेंस सेवा देनी है. हकीकत यह है कि देख-रेख के अभाव में यहां 12 एंबुलेंस सड़ गये, तो पांच-छह एंबुलेंस पैसे के अभाव में गैरेज में सड़ रहे हैं.
प्रसुता को अस्पताल में रखना है 48 घंटे
प्रसुता को प्रसव के बाद 48 घंटे अस्पताल में रखना है, ताकि प्रसव के बाद रक्तश्राव की समस्या आये, तो नियंत्रित किया जा सके. इस दौरान दवा व जच्चा-बच्चे के भोजन, दूध आदि का खर्च अस्पताल को देना है. लेकिन यहां तो प्रसव के कुछ घंटे बाद महिला को बाजार से दवा के लिए पर्ची थमा डिस्चार्ज कर दिया जाता है और पंजी में 48 घंटे का खर्च दिखाना जांच का विषय है.
ग्रामीण स्वच्छता समिति की
राशि कहां होती है खर्च?
प्रसव के दौरान दवा के लिए
नहीं मिलते 600 रुपये
गर्भवती महिला को आयरन व कैल्शियम गोलियां दुर्लभ
प्रसव के बाद 48 घंटे रखने की होती है कागजी खानापूर्ति
गांव का एंबुलेंस बना टेंपो
जर्जर हो गये 12 एंबुलेंस
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