"सर, रसाेई में बर्तन धोते हैं, फिर भी खाने में रोटी व पीने को साफ पानी नहीं मिलता"

Published at :24 Sep 2019 3:18 AM (IST)
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"सर, रसाेई में बर्तन धोते हैं, फिर भी खाने में रोटी व पीने को साफ पानी नहीं मिलता"

भागलपुर : प्रशिक्षु वरीय उप समाहर्ता विकास कुमार कर्ण शनिवार को जब मूक बधिर स्कूल के छात्रावास में गये, तो वहां के बच्चों के दर्द ने उन्हें भी झकझोर कर रख दिया. दिव्यांग बच्चों ने कहा कि खुद ही रसोई में बर्तन धोते हैं, लेकिन यहां साफ पानी पीने को नहीं मिलता है. अभी तक […]

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भागलपुर : प्रशिक्षु वरीय उप समाहर्ता विकास कुमार कर्ण शनिवार को जब मूक बधिर स्कूल के छात्रावास में गये, तो वहां के बच्चों के दर्द ने उन्हें भी झकझोर कर रख दिया. दिव्यांग बच्चों ने कहा कि खुद ही रसोई में बर्तन धोते हैं, लेकिन यहां साफ पानी पीने को नहीं मिलता है. अभी तक खाना में सिर्फ चावल-दाल और आलू की सब्जी दी जाती है,कभी भी रोटी नहीं दिया जाता है. सुबह के समय नाश्ता नहीं मिलता है और शाम में चूड़ा-चीनी दिया जाता है.

बच्चों के दर्द को बाद में चिकित्सीय जांच ने भी पुष्टि कर दी. छात्रावास के 18 में से 16 बच्चे चिकित्सीय जांच में कुपोषण के शिकार पाये गये. कई बच्चों के शरीर पर कटे-जले के निशान भी मिले हैं. छात्रावास में हर क्षेत्र में अनियमितता पायी गयी, इनमें पढ़ाने से लेकर लालन-पालन और खाने में मिले. डीएम को भेजे गये रिपोर्ट में प्रशिक्षु एसडीसी ने वहां के प्रिंसिपल सहित शिक्षक आदि को हटाने की सिफारिश की है. दरअसल डीएम ने 20 सितंबर को प्रशिक्षु आइएएस, आइपीएस व एसडीसी की टीम का गठन हुआ और उनसे 21 सितंबर को करके सामाजिक सुरक्षा कोषांग से संचालित मूक बधिर स्कूल, नेत्रहीन विद्यालय, वृद्धाश्रम आदि का औचक निरीक्षण करवाया गया.
न पढ़ाने का रूटीन, परीक्षा लेने संबंधी कागजात नहीं : एसडीसी ने अपनी जांच में पाया कि दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने का कोई रूटीन नहीं है. साल में दो बार परीक्षा यानि छह-छह माह में होती है, मगर पहली छमाही की परीक्षा सितंबर से दिसंबर तक ली गयी. परीक्षा के संबंध में कागजात यानि प्रश्नपत्र व उत्तर पेपर, अंकपत्र नहीं दिखाया गया. इस तरह कोई संधारण का रजिस्टर भी नहीं प्रस्तुत किया गया. एसडीसी की जांच में छात्रावास में कैशबुक मेंटेननहीं मिला.
महीने दिये जाते हैं. कुल 30 बच्चों के छात्रावास को लेकर 45 हजार रुपये आवंटन आता है. इसमें प्रत्येक महीने कितने बच्चे हैं, कितने खाने व अन्य मद में खर्च होते हैं, इसका कोई हिसाब-किताब स्पष्ट तौर पर नहीं लिखा गया.
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