गुरु के स्मृति चिह्न को देखा, ली जानकारी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :04 Apr 2017 5:11 AM (IST)
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भूपेंद्रनाथ सान्याल गये थे महामहिम के घर बटुकों ने स्वस्ति वाचन से किया स्वागत सान्याल बाबा के स्मृति चिह्न को देखा बांका : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पहुंचने के बाद आश्रम में गुरुभाई-बहन उनकी झलक पाने को बेकरार हो गये. महामहिम के स्वागत के लिए गुरुधाम आश्रम को फूलों से सजाया गया था. मंदिर में […]
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भूपेंद्रनाथ सान्याल गये थे महामहिम के घर
बटुकों ने स्वस्ति वाचन से किया स्वागत
सान्याल बाबा के स्मृति चिह्न को देखा
बांका : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पहुंचने के बाद आश्रम में गुरुभाई-बहन उनकी झलक पाने को बेकरार हो गये. महामहिम के स्वागत के लिए गुरुधाम आश्रम को फूलों से सजाया गया था. मंदिर में प्रवेश करते ही वेद बटुकों ने वेद मंत्रोच्चार के साथ उनका स्वागत किया. अपने निर्धारित समय से 25 मिनट पहले महामहिम का आगमन गुरुधाम आश्रम में हुआ. ब्रह्मचारियों द्वारा स्वस्तिक वाचन के बाद आश्रम के सचिव ऋषिकेष पांडेय, गुरुदेव की पौत्री बाबली पाठक, शेषाद्री दूबे और प्रमोद झुनझुनवाला द्वारा महामहिम की अगुआई की गयी और उन्हें मंदिर ले जाया गया. राष्ट्रपति सबसे पहले मुख्य मंदिर पहुंचे. मंदिर में गुरुदेव आचार्य भूपेन्द्र नाथ सन्याल को पुष्प चढ़ा कर पूजा-अर्चना की.
वहां पर मौजूद पंडित रतीश चंद्र झा, पंडित देवनारायण शर्मा, पंडित गंगाधर मिश्र के द्वारा सबसे पहले गुरु की पूजा करवायी गयी, जिसमें आत्मशुद्धि, आचमन एवं स्वस्ति वाचन के बाद मंत्रों से परम गुरु महाराज श्यामाचरण लाहिड़ी एवं भूपेन्द्र नाथ सन्याल एवं उनकी पत्नी का षोडषोपचार पद्धति से पूजन कराया गया. इसके बाद वे पंचायतन शिव मंदिर पहुंचे, जहां राष्ट्र कल्याण हेतु संकल्प लेकर भगवान शिव का षोडषोपचार का पूजन, आरती एवं पुष्पांजलि की. इसके बाद महामहिम आश्रम परिसर में बने सन्याल बाबा की कुटिया पहुंचे. मौके पर मौजूद उनकी पौत्री बाबली पाठक और आश्रम के सचिव भी थे. बाबली पाठक ने उन्हें बताया कि इस भवन में रखी हुई सारी वस्तुएं गुरु महाराज के द्वारा उपयोग की गयी है, जिनमें चरण चिह्न, चित्र व फर्नीचर व अन्य सामान मौजूद हैं. आश्रम के सचिव ऋषिकेष पांडेय ने बताया कि धरोहरों को देखने के बाद राष्ट्रपति ने कहा कि उनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी ने 1941 में व उनकी मां राजलक्ष्मी मुखर्जी ने 1950 में गुरुदेव से दीक्षा ग्रहण की थी.
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