जो व्यक्ति समय की नब्ज को नहीं पहचानता, दुर्दशा उसकी सहचरी बन जाती है''

Updated at : 23 Jan 2020 8:33 AM (IST)
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जो व्यक्ति समय की नब्ज को नहीं पहचानता, दुर्दशा उसकी सहचरी बन जाती है''

औरंगाबाद कार्यालय : जिला स्थापना दिवस के आलोक में जन विकास परिषद एवं जनेश्वर विकास केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में हरिओम कॉमर्स कोचिंग सेंटर के प्रांगण मे सुख्यात आंचलिक कथाकार शिवपूजन सहाय की कहानी पर बतकही आयोजित की गई. साहित्यिक विमर्श बतकहीं की 24 वीं कड़ी के उत्तरार्ध की अध्यक्षता पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉक्टर सिद्धेश्वर […]

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औरंगाबाद कार्यालय : जिला स्थापना दिवस के आलोक में जन विकास परिषद एवं जनेश्वर विकास केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में हरिओम कॉमर्स कोचिंग सेंटर के प्रांगण मे सुख्यात आंचलिक कथाकार शिवपूजन सहाय की कहानी पर बतकही आयोजित की गई. साहित्यिक विमर्श बतकहीं की 24 वीं कड़ी के उत्तरार्ध की अध्यक्षता पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉक्टर सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह तथा संचालन संस्था के सचिव सिद्धेश्वर विद्यार्थी ने किया. सर्वप्रथम आयोजक प्रोफेसर अनिल कुमार सिंह ने आगत साहित्यकारों का सम्मान पुष्प मालाओं से किया.

कहानी का वाचन शिक्षक उज्जवल रंजन द्वारा किया गया. तत्पश्चात साहित्यसेवियों द्वारा इस पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी दी गई . बतकही का श्रीगणेश करते हुए डॉ रामाशीष सिंह ने कहा कि समय साक्षी है ,किसी व्यक्ति की काली कमाई कभी- फलवती नहीं होती और यह बात पठित कहानी से प्रमाणित भी हो जाती है .
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए डॉ सुरेंद्र प्रसाद मिश्र ने कहा जो व्यक्ति घर आई लक्ष्मी की रक्षा नहीं करता,लक्ष्मी भी उसकी रक्षा नहीं करती और पुनः उसे मुंशी जी जैसी दर्दनाक और फटेहाली की जिंदगी के लिए विवश होना पड़ता है. डा. रामाधार सिंह ने कहा कि दहेज की अमानुषिक व्यवस्था पर सहाय जी ने भगजोगनी का संदर्भ देते हुए कुठाराघात किया है .
शिक्षाविद शिव नारायण सिंह ने कहानी में प्रयुक्त शब्द विन्यास, मुहावरे, लोकोक्तियां के साथी कहानी की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला. अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह ने कहा कि दहेज की अमानुषिक विकृति प्रकारांतर से कई अन्य विकृतियों को भी पैदा कर देती है जिनमें बेमेल विवाह, मनोदैहिक व्यभिचार तथा आर्थिक विपन्नता की दर्दनाक स्थितियों के रुप में समाज के सामने परोसा जाता है .
इस अवसर पर जिन लोगों ने प्रमुख रूप से अपनी सहभागिता निभाई उनमें डॉक्टर हनुमान राम, डॉ शिवपूजन सिंह ,शैलेंद्र मिश्र शैल, राम किशोर सिंह, शिक्षक चंदन कुमार, लाल मोहन प्रसाद, महाराणा प्रताप संस्थान के सचिव अनिल कुमार सिंह ,अधिवक्ता विनोद मालाकार, शिवनंदन पांडे, श्रीनिवास पाठक, प्रवीण कुमार सिंह, अवधेश कुमार आदि थे.
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