इमरजेंसी में एंबुलेंस यानी मुश्किल में जान

Updated at : 14 May 2018 6:08 AM (IST)
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इमरजेंसी में एंबुलेंस यानी मुश्किल में जान

बिना जी हुजूरी के नहीं मिल पाती है सेवा औरंगाबाद कार्यालय : एंबुलेंस की सेवा किसी भी अस्पताल के लिए काफी महत्वपूर्ण है. साथ ही पीड़ित या मरीज के लिए. अक्सर एंबुलेंस काे इमरजेंसी सेवा के रूप में ही देखा जाता है. ऐसे में इसकी महता काफी बढ़ जाती है. जिले में सदर अस्पताल में […]

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बिना जी हुजूरी के नहीं मिल पाती है सेवा

औरंगाबाद कार्यालय : एंबुलेंस की सेवा किसी भी अस्पताल के लिए काफी महत्वपूर्ण है. साथ ही पीड़ित या मरीज के लिए. अक्सर एंबुलेंस काे इमरजेंसी सेवा के रूप में ही देखा जाता है. ऐसे में इसकी महता काफी बढ़ जाती है. जिले में सदर अस्पताल में मुख्य रूप से एंबुलेंस सेवा दी जाती है, पर यहां की व्यवस्था काफी लचर है.
रविवार काे जब एंबुलेंस के लिए 102 नंबर पर कॉल किया गया, तो 10 मिनट में एंबुलेंस उपलब्ध कराने की बात कही गयी, पर एंबुलेंस कन्फर्म होने की कॉल 45 मिनट बाद आयी. ऐसी स्थिति का सामना आये दिन लोगों को करना पड़ता है. कई लोगों ने बताया कि एंबुलेंस को लेकर उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कुछ लोगों ने यह भी बताया कि सदर अस्पताल में शव वाहन की सेवा उन्हीं लोगों को मिलती है, जिनकी पैरवी होती है.
गर्भवती महिलाओं को अक्सर होती है परेशानी : गर्भवती महिलाओं को प्रसव होने की स्थिति में एंबुलेंस की सेवा मुश्किल से मिल पाती है. वैसे जिले में हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एंबुलेंस की सेवा है, पर बिना जी हुजूरी के सेवा नहीं मिल पाता है.
सदर अस्पताल की बात की जाये, तो यहां प्रतिदिन 15 से 20 गर्भवती महिलाएं प्रसव कराने पहुंचती हैं. सरकार का निर्देश है कि महिलाओं को जरूरत के अनुसार एंबुलेंस की सेवा उपलब्ध करानी है, पर सदर अस्पताल में एंबुलेंस की कमी हर वक्त महसूस होती है. हालांकि सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ राजकुमार प्रसाद कहते है कि एंबुलेंस पर्याप्त है और हर वक्त मरीजों की सेवा दी जाती है. कभी-कभी एक से अधिक दुर्घटनाएं होने
और घायलों को रेफर करने की
स्थिति में एंबुलेंस की कमी महसूस होने लगती है.
प्राइवेट एंबुलेंस की कटती है चांदी
सदर अस्पताल के आसपास प्राइवेट एंबुलेंस चालक मरीजों की ताक में रहते हैं. अक्सर सरकारी एंबुलेंस नहीं मिल पाने के बाद प्राइवेट एंबुलेंस का सहारा लिया जाता है. ऐसे में राशि अधिक खर्च करनी पड़ती है. औरंगाबाद से गया, पटना, वाराणसी व जमुहार भेजने के लिए सरकारी एंबुलेंस की सेवा मिल जाती है, पर अधिक दूरी तय करने के लिए प्राइवेट एंबुलेंस ही सहारा बनते हैं. ऐसे में रुपये अधिक देने पड़ते है.
एजेंसी देखती है व्यवस्था
वैसे 108, 102,1099 और शव वाहन की सेवा अभी सामान्य फाउंडेशन पशुपतिनाथ नामक कंपनी के अधीन है. मरीजों को विभिन्न अस्पतालों में पहुंचाने के लिए ईंधन सरकार द्वारा दी जाती है और इसका बिल जिला स्वास्थ्य समिति के देखरेख में बनायी जाती है, जहां तक एंबुलेंस चालकों की वेतन की बात है तो उन्हें समय पर वेतन नहीं दिया जाता है. इस कारण वे कमोवेश हड़ताल पर रहते है.
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